क्या आम आदमी भी खुद को दिवालिया घोषित कर सकता है? सुभाष चंद्रा केस से समझिए Personal Insolvency का पूरा नियम

क्या आम आदमी भी खुद को दिवालिया घोषित कर सकता है? सुभाष चंद्रा केस से समझिए Personal Insolvency का पूरा नियम

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Personal Bankruptcy In India:  अगर कोई बड़ा कारोबारी अपने कर्ज को चुकाने में असमर्थ होने पर पर्सनल इंसॉल्वेंसी की प्रक्रिया का सामना कर सकता है, तो क्या आम आदमी भी ऐसा कर सकता है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज बड़ी संख्या में लोग होम लोन, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड और दूसरे तरह के कर्ज लेते हैं। अगर किसी व्यक्ति की आमदनी अचानक कम हो जाए और वह लगातार बढ़ते कर्ज की किस्तें चुकाने में सक्षम न रहे, तो उसके पास क्या कानूनी रास्ता है?

एस्सेल ग्रुप के अध्यक्ष सुभाष चंद्रा से जुड़े पर्सनल इंसॉल्वेंसी मामले ने इस सवाल को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, उनके खिलाफ दायर व्यक्तिगत दिवालियापन मामले में करीब 6.5 करोड़ रुपये का भुगतान करना है, जबकि बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाओं की ओर से करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के दावे किए गए थे। ऐसे में रिकवरी की रकम दावे की तुलना में बेहद कम रही। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि भारत में कोई आम व्यक्ति अगर भारी कर्ज में फंस जाए और उसे चुका न पाए, तो क्या वह भी खुद को दिवालिया घोषित कर सकता है?

IBC आम आदमी को पूरी तरह क्यों कवर नहीं करता? Personal Bankruptcy In India

भारत में दिवालियापन और कर्ज समाधान के लिए सबसे महत्वपूर्ण कानून Insolvency and Bankruptcy Code यानी IBC, 2016 है। इसका उद्देश्य दिवालियापन की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना और कर्ज की वसूली के लिए एक स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार करना था। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। IBC का Part III, जो व्यक्तियों और पार्टनरशिप फर्मों की insolvency और bankruptcy से जुड़ा है, आम लोगों के लिए पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। हालांकि, इसका एक महत्वपूर्ण अपवाद है। अगर किसी व्यक्ति ने किसी कंपनी या पार्टनरशिप फर्म द्वारा लिए गए कॉर्पोरेट लोन की व्यक्तिगत गारंटी दी है और बाद में वह कर्ज डिफॉल्ट हो जाता है, तो उस गारंटर के खिलाफ IBC के तहत व्यक्तिगत insolvency की कार्यवाही शुरू हो सकती है। यही वजह है कि बड़े कॉर्पोरेट लोन से जुड़े मामलों में बिजनेस मालिकों या प्रमोटरों के खिलाफ व्यक्तिगत insolvency की कार्यवाही देखने को मिलती है। लेकिन अगर कोई आम व्यक्ति सिर्फ अपना पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड का कर्ज या अन्य व्यक्तिगत उधार नहीं चुका पा रहा है, तो उसके लिए स्थिति अलग है।

क्या आम आदमी के लिए रास्ता पूरी तरह बंद है?

नहीं। किसी व्यक्ति के पास व्यक्तिगत insolvency से निपटने के लिए कानूनी रास्ते मौजूद हैं। हालांकि, आम व्यक्ति के लिए यह प्रक्रिया IBC के कॉर्पोरेट insolvency framework जितनी आधुनिक और व्यापक नहीं है। भारत में व्यक्तिगत दिवालियापन से जुड़े पुराने कानून अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

1. Presidency-towns Insolvency Act, 1909

यह कानून ऐतिहासिक रूप से मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख प्रेसीडेंसी शहरों से संबंधित रहा है।

2. Provincial Insolvency Act, 1920

देश के दूसरे हिस्सों में व्यक्तिगत insolvency से जुड़े मामलों के लिए यह कानून लागू रहा है। दोनों कानून ऐसे समय के हैं जब आज जैसी क्रेडिट कार्ड अर्थव्यवस्था, डिजिटल लेंडिंग, ऑनलाइन पर्सनल लोन और इंस्टेंट लोन ऐप्स मौजूद नहीं थे। यही कारण है कि मौजूदा वित्तीय व्यवस्था की तुलना में व्यक्तिगत insolvency का यह ढांचा काफी पुराना माना जाता है।

सिर्फ बैंक जाकर नहीं कह सकते कि 'मैं दिवालिया हूं'

अगर कोई व्यक्ति कर्ज नहीं चुका पा रहा है, तो वह केवल बैंक में जाकर यह घोषणा नहीं कर सकता कि वह दिवालिया हो गया है। इसके लिए औपचारिक कानूनी प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है। आमतौर पर व्यक्ति को संबंधित अदालत में आवेदन करना होता है और अपनी वित्तीय स्थिति से जुड़ी विस्तृत जानकारी देनी पड़ सकती है।

इसमें शामिल हो सकते हैं—

  • कुल बकाया कर्ज
  • किन-किन बैंकों या वित्तीय संस्थाओं से कर्ज लिया है
  • आय का स्रोत
  • उपलब्ध संपत्तियां
  • देनदारियां
  • अन्य वित्तीय दायित्व

अदालत मामले की परिस्थितियों को देखती है और संबंधित पक्षों को सुनने के बाद आगे की कार्रवाई करती है।

इसलिए केवल यह कहना कि 'मेरे पास पैसे नहीं हैं, इसलिए मुझे दिवालिया घोषित कर दिया जाए' पर्याप्त नहीं होता।

दिवालिया घोषित होने के बाद क्या होता है?

यह समझना भी बेहद जरूरी है कि दिवालिया घोषित होना कर्ज से आसान छुटकारा नहीं है। इस प्रक्रिया के व्यक्ति की संपत्ति और भविष्य की वित्तीय स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। परिस्थितियों और लागू कानून के अनुसार व्यक्ति की कुछ संपत्तियों को कर्ज चुकाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें घर, वाहन, गहने या अन्य परिसंपत्तियां शामिल हो सकती हैं, हालांकि कानून के तहत कुछ आवश्यक संपत्तियों को सुरक्षा भी मिल सकती है। यानी insolvency का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति अपनी सारी संपत्ति अपने पास रख लेगा और उसके सभी कर्ज अपने आप खत्म हो जाएंगे।

क्रेडिट स्कोर और भविष्य की वित्तीय जिंदगी पर भी असर

दिवालियापन की प्रक्रिया का असर केवल मौजूदा कर्ज तक सीमित नहीं रहता। किसी व्यक्ति की क्रेडिट हिस्ट्री और भविष्य में कर्ज लेने की क्षमता पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाएं भविष्य में उस व्यक्ति को लोन देने में अधिक जोखिम देख सकती हैं। इसका असर होम लोन, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड और दूसरी क्रेडिट सुविधाओं तक पहुंच पर पड़ सकता है।

यानी insolvency एक ऐसा कदम है जिसके कानूनी और वित्तीय दोनों तरह के लंबे समय तक चलने वाले परिणाम हो सकते हैं।

सुभाष चंद्रा केस से क्या समझ आता है?

सुभाष चंद्रा से जुड़ा मामला यह दिखाता है कि कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति के खिलाफ व्यक्तिगत insolvency की कार्यवाही संभव है, खासकर जब मामला कॉर्पोरेट कर्ज और व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ा हो। लेकिन इसे आम व्यक्ति के पर्सनल लोन वाले मामले से सीधे जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। आम आदमी के लिए व्यक्तिगत दिवालियापन की व्यवस्था भारत में मौजूद जरूर है, लेकिन IBC के तहत व्यक्तियों की insolvency का पूरा ढांचा अभी उसी तरह लागू नहीं है, जैसा कंपनियों और कॉर्पोरेट देनदारों के लिए है।

कर्ज में फंसने पर क्या करना चाहिए?

अगर कोई व्यक्ति लगातार बढ़ते कर्ज और EMI के दबाव में है, तो भुगतान बंद करने से पहले बैंक या लेंडर से बातचीत करना ज्यादा उचित हो सकता है। परिस्थितियों के अनुसार loan restructuring, repayment rescheduling या settlement जैसे विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। अगर मामला गंभीर है और व्यक्ति वास्तव में अपने कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं है, तो किसी योग्य insolvency lawyer या वित्तीय सलाहकार से अपनी स्थिति के अनुसार कानूनी सलाह लेना बेहतर होता है।

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