ट्रंप-नेतन्याहू तनाव ने उठाया बड़ा सवाल, क्या अमेरिका और इजरायल हमेशा से रहे हैं सबसे करीबी दोस्त?
ट्रंप-नेतन्याहू तनाव ने उठाया बड़ा सवाल, क्या अमेरिका और इजरायल हमेशा से रहे हैं सबसे करीबी दोस्त?
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu की करीबी दोस्ती लंबे समय से दुनिया भर में चर्चा का विषय रही है। हालांकि ईरान युद्धविराम को लेकर हाल के मतभेदों और ट्रंप के सख्त बयानों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका और इजरायल के रिश्ते हमेशा से इतने मजबूत और सहज रहे हैं। इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि दोनों देशों का संबंध केवल दोस्ती नहीं, बल्कि रणनीतिक हितों, वैश्विक राजनीति और कई उतार-चढ़ावों से जुड़ा रहा है।
इजरायल बनने से पहले ही मिला था अमेरिकी समर्थन
अमेरिका और इजरायल के संबंधों की नींव उस समय रखी गई थी जब इजरायल एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में भी नहीं आया था। फलस्तीन में यहूदी होमलैंड बनाने के विचार को अमेरिका का शुरुआती समर्थन प्राप्त था। 1917 के बालफोर घोषणापत्र के बाद 1919 में अमेरिकी राष्ट्रपति Woodrow Wilson ने भी इस विचार का समर्थन किया। बाद के वर्षों में अमेरिकी संसद ने भी इस दिशा में कई प्रस्ताव पारित किए।
महज 11 मिनट में मिली मान्यता
1948 में जब इजरायल ने स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपने अस्तित्व की घोषणा की, तो अमेरिका उसे मान्यता देने वाला पहला देश बना। तत्कालीन राष्ट्रपति Harry S. Truman ने इजरायल की स्वतंत्रता घोषणा के केवल 11 मिनट बाद उसे आधिकारिक मान्यता प्रदान कर दी। यह कदम उस समय के वैश्विक राजनीतिक समीकरणों और अमेरिका के रणनीतिक हितों से प्रेरित माना जाता है।
शीत युद्ध ने बढ़ाई नजदीकियां
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुए शीत युद्ध के दौर में पश्चिम एशिया महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया। तेल भंडार और महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों पर प्रभाव बनाए रखने के लिए अमेरिका को क्षेत्र में एक भरोसेमंद सहयोगी की जरूरत थी। इजरायल इस भूमिका के लिए उपयुक्त माना गया और धीरे-धीरे दोनों देशों के रिश्ते मजबूत होते गए।
स्वेज संकट में आमने-सामने आए दोनों देश
हालांकि दोनों देशों के रिश्ते हमेशा मधुर नहीं रहे। 1956 के स्वेज संकट के दौरान जब इजरायल ने ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर मिस्र के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की, तब अमेरिकी राष्ट्रपति Dwight D. Eisenhower ने कड़ा विरोध किया। अमेरिका ने इजरायल पर कब्जे वाले क्षेत्रों को खाली करने का दबाव बनाया और आर्थिक-सैन्य सहायता रोकने तक की चेतावनी दी।
परमाणु कार्यक्रम पर भी हुआ टकराव
1960 के दशक में इजरायल के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका की चिंताएं बढ़ गई थीं। राष्ट्रपति John F. Kennedy के प्रशासन ने इजरायल के परमाणु प्रयासों को लेकर सवाल उठाए और दोनों देशों के बीच कई दौर की कूटनीतिक तनातनी देखने को मिली।
छह दिन की जंग ने बदल दी तस्वीर
1967 के अरब-इजरायल युद्ध ने अमेरिका की सोच को पूरी तरह बदल दिया। इजरायल ने केवल छह दिनों में मिस्र, जॉर्डन और सीरिया जैसी सेनाओं को पराजित कर अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया। इस जीत ने अमेरिकी रणनीतिकारों को यह विश्वास दिलाया कि इजरायल पश्चिम एशिया में अमेरिका का सबसे प्रभावी साझेदार बन सकता है।
सोवियत प्रभाव को मिला बड़ा झटका
उस समय मिस्र और सीरिया सोवियत संघ के करीबी सहयोगी माने जाते थे। इजरायल की जीत ने क्षेत्र में सोवियत प्रभाव को कमजोर कर दिया। इसके बाद अमेरिका ने इजरायल को केवल सहयोगी नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करने वाले स्थायी साझेदार के रूप में देखना शुरू कर दिया।
आज भी क्यों मजबूत हैं रिश्ते?
आज अमेरिका और इजरायल के संबंध कई स्तरों पर मजबूत बने हुए हैं। पश्चिम एशिया में सुरक्षा, खुफिया सहयोग, सैन्य साझेदारी और क्षेत्रीय रणनीति इसके प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा अमेरिकी घरेलू राजनीति, इजरायल समर्थक समूहों का प्रभाव और दोनों देशों के साझा सुरक्षा हित भी इस रिश्ते को मजबूती प्रदान करते हैं।