विश्व नेत्रदान दिवस विशेष: पूज्य गुरु जी की पावन प्रेरणा से लौटी हजारों जिंदगियों की रोशनी
फतेहाबाद की भारती की आंखें भी हुईं रोशन
World Eye Donation Day 2026: सरसा (सच कहूँ/सुनील वर्मा/विनोद शर्मा )। करीब आठ महीने पहले तक फतेहाबाद निवासी 28 वर्षीय भारती पत्नी सोनू की जिंदगी अंधेरे में डूबी हुई थी। दोनों आंखों की रोशनी चली जाने के कारण उनके लिए जीवन की राह मुश्किल हो गई थी। घर का कामकाज हो, खाना खाना हो या कहीं आना-जाना, हर छोटे-बड़े काम के लिए उन्हें दूसरों का सहारा लेना पड़ता था। कई अस्पतालों और चिकित्सकों से उपचार कराने के बावजूद कोई लाभ नहीं हुआ। Fatehabad News
ऐसे में चिकित्सकों ने उन्हें कॉर्निया प्रत्यारोपण (पेनिट्रेटिंग केराटोप्लास्टी) की सलाह दी। उम्मीद की इसी किरण के साथ भारती सरसा स्थित शाह सतनाम जी स्पेशलिटी अस्पताल पहुंचीं। यहां पूज्य माता करतार कौर जी इंटरनेशनल आई बैंक (Pujya Mata Kartar Kaur Ji International Eye Bank) के माध्यम से उनकी दोनों आंखों का सफल कॉर्निया प्रत्यारोपण किया गया। ऑपरेशन के बाद जब भारती ने दोबारा इस खूबसूरत दुनिया को देखा तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। जो जिंदगी कभी अंधेरे में खो चुकी थी, वह फिर से रोशनी, आत्मविश्वास और नई उम्मीदों से भर उठी।
भारती की यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की दास्तान है, जिनके जीवन में नेत्रदान के माध्यम से उजाला लौटा है। यह संभव हुआ है डेरा सच्चा सौदा के पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की पावन प्रेरणा से चलाए जा रहे मानवता भलाई के कार्यों के कारण।
पूज्य गुरु जी ने हमेशा मानवता की सेवा को सर्वोच्च धर्म बताते हुए जरूरतमंदों की सहायता के लिए समाज को प्रेरित किया है। ज्योतिदान यानी मरणोपरांत नेत्रदान भी उन्हीं 175 मानवता भलाई कार्यों में से एक है, जिसने हजारों लोगों के जीवन में नई रोशनी पहुंचाई है। पूज्य गुरु जी की प्रेरणा का ही परिणाम है कि डेरा सच्चा सौदा के लाखों अनुयायियों ने नेत्रदान को एक जनआंदोलन का रूप दिया है। अब तक 18,643 डेरा अनुयायियों की ओर से मरणोपरांत नेत्रदान किया जा चुका है। इनमें से 18,125 से अधिक नेत्रदान सरसा स्थित पूज्य माता करतार कौर जी इंटरनेशनल आई बैंक में दर्ज किए गए हैं, जबकि डेढ़ लाख से अधिक श्रद्धालु अपनी मृत्यु के बाद नेत्रदान करने का लिखित संकल्प ले चुके हैं।
शाह सतनाम जी स्पेशलिटी अस्पताल की नेत्र रोग विशेषज्ञा डॉ. मोनिका गर्ग इन्सां के अनुसार किसी व्यक्ति के निधन के बाद उसकी आंखों का कॉर्निया दो जरूरतमंद व्यक्तियों को रोशनी दे सकता है। यही कारण है कि नेत्रदान को महादान कहा जाता है। यह केवल आंखों का दान नहीं, बल्कि किसी की खो चुकी उम्मीदों, सपनों और आत्मविश्वास को वापस लौटाने का माध्यम है। जब कोई व्यक्ति इस दुनिया से विदा होने के बाद भी अपनी आंखें दान करता है, तो वह किसी दूसरे के जीवन में उजाला बनकर हमेशा जीवित रहता है।
पूज्य गुरु जी का संदेश: आंखें साथ नहीं जाती, किसी की जिंदगी रोशन कर जाती हैं
पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि कुछ लोग कहते हैं कि यदि आंखें किसी को दान कर दी जाएं तो अगले जन्म में आंखें नहीं मिलेंगी। इस पर पूज्य गुरु जी समझाते हैं कि क्या कोई अपनी आंखें अपने साथ लेकर जा सकता है? जब शरीर का अंतिम संस्कार किया जाता है तो आंखें भी उसी में नष्ट हो जाती हैं और यदि दफनाया जाता है तो वे मिट्टी में गल जाती हैं। ऐसे में बेहतर यही है कि इंसान जाते-जाते अपनी आंखें दान कर जाए, ताकि उसकी आंखों से कोई दृष्टिबाधित व्यक्ति इस संसार को देख सके। पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि जिन जरूरतमंदों को रोशनी मिलेगी, उनकी दुआएं दानदाता और उसकी आने वाली पीढ़ियों के लिए आशीर्वाद बनेंगी। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे नेक और मानवता भलाई के कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेना चाहिए।
