UCC क्या है? समान नागरिक संहिता का मतलब, उद्देश्य और प्रावधान, जानें किन मामलों पर होगा असर
UCC क्या है? समान नागरिक संहिता का मतलब, उद्देश्य और प्रावधान, जानें किन मामलों पर होगा असर
नई दिल्ली। UCC in India: समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी (Uniform Civil Code) देश में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। इसका मूल विचार यह है कि धर्म, जाति या लिंग के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, गोद लेने और संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे नागरिक मामलों में समान कानूनी नियम लागू किए जाएं।
यूसीसी को लेकर देश में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर लगातार बहस होती रही है। इसके समर्थक इसे समानता और एकरूपता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानते हैं, जबकि इसके प्रावधानों और विभिन्न समुदायों की परंपराओं को लेकर अलग-अलग मत भी सामने आते रहे हैं।
क्या है समान नागरिक संहिता?
समान नागरिक संहिता का अर्थ ऐसे समान नागरिक कानूनों से है, जो सभी नागरिकों पर उनके धर्म या समुदाय की परवाह किए बिना लागू हों। वर्तमान में भारत में कई व्यक्तिगत मामलों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के पर्सनल लॉ लागू होते हैं।
यूसीसी के तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे और गोद लेने जैसे मामलों के लिए समान नियम बनाए जाने की अवधारणा है।
UCC का क्या है उद्देश्य?
समान नागरिक संहिता के प्रमुख उद्देश्यों में कानून के सामने समानता, महिलाओं को समान अधिकार देना और व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभाव को कम करना शामिल है।
इसके समर्थकों का तर्क है कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण नागरिक मामलों में कानूनी व्यवस्था जटिल हो सकती है। समान कानून लागू होने से नागरिक मामलों से जुड़ी व्यवस्था को सरल और अधिक एकरूप बनाया जा सकता है।
संविधान में कहां है UCC का प्रावधान?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 (Article 44) में समान नागरिक संहिता का उल्लेख किया गया है। यह संविधान के राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) का हिस्सा है।
अनुच्छेद 44 के अनुसार राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। हालांकि नीति निदेशक तत्व सामान्यतः अदालत में सीधे लागू कराने योग्य अधिकार नहीं होते, लेकिन वे शासन के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
किन मामलों पर लागू हो सकता है UCC?
यूसीसी का संबंध मुख्य रूप से नागरिक यानी सिविल मामलों से है। इसके दायरे में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार, गोद लेने और कुछ परिस्थितियों में लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े नियम शामिल हो सकते हैं।
यह आपराधिक कानून की समान व्यवस्था से अलग विषय है। यानी UCC का मुख्य फोकस व्यक्तिगत और पारिवारिक नागरिक कानूनों को एक समान करना है।
गोवा और उत्तराखंड में क्या स्थिति है?
गोवा में पुर्तगाली सिविल कोड से विकसित एक समान नागरिक कानून व्यवस्था लंबे समय से लागू है। इसी वजह से गोवा को भारत में समान नागरिक संहिता की बहस में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के तौर पर देखा जाता है।
इसके बाद उत्तराखंड ने 2025 में अपना समान नागरिक संहिता कानून लागू किया। राज्य में इसके लागू होने के बाद विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों के लिए निर्धारित नियमों को लेकर देशभर में चर्चा तेज हुई।
क्या आदिवासी समुदाय UCC से बाहर हो सकते हैं?
समान नागरिक संहिता को लेकर अनुसूचित जनजातियों (ST) की पारंपरिक व्यवस्था और सांस्कृतिक अधिकार भी महत्वपूर्ण मुद्दा रहे हैं। आदिवासी समुदायों की विशिष्ट परंपराओं और प्रथाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें UCC के दायरे से बाहर रखने की व्यवस्था कुछ कानूनों में की गई है।
इसलिए UCC की व्यवस्था को समझते समय यह देखना जरूरी है कि संबंधित कानून में किन समुदायों और क्षेत्रों को इसके प्रावधानों से छूट दी गई है।
UCC को लेकर क्यों होती है बहस?
समान नागरिक संहिता के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क समान नागरिक अधिकार और लैंगिक समानता का है। वहीं विरोध या चिंता जताने वाले पक्षों का कहना है कि अलग-अलग समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को भी पर्याप्त संरक्षण मिलना चाहिए।
यही वजह है कि भारत में UCC केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक, संवैधानिक और राजनीतिक बहस का भी महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।