एशियाई देशों को सीख लेने की आवश्यकता

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कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को सबक सिखा दिया है, खास तौर पर एशिया के देशों को। एशियाई देशों ने युद्ध से निपटने के लिए कई टैंक, लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां, मिसाइलें तो बनाई लेकिन मेडिकल के क्षेत्र में इन देशों के हालात बेहद लाचारी वाले हैं। पाकिस्तान जैसे देशों की देखा-देखी परमाणु बम भी बना लिया, लेकिन हालात यह हैं कि यह देश बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से भी निपटने की क्षमता भी नहीं पा रहे। जहां तक कोरोना महामारी का संबंध है गरीब देश तो दूर की बात, विकासशील मुल्कों के पास भी अस्पताल, ऑक्सीजन, वैंटीलेंटर, दवाओं व वैक्सीन की पर्याप्त व्यवस्था उपलबध नहीं। दूसरी तरफ अमेरिका, रूस, चीन जैसे विकसित देशों ने बड़े स्तर पर वैक्सीन अभियान छेड़कर बड़ी संख्या में लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज लगा दी हैं।

हमारे देश में मानवीय जीवन को बचाने के पर्याप्त प्रबंध नहीं, सुविधाओं का टोटा है। हमें अस्पतालों में संसाधनों को बढ़ाने की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें अपने पारंपरिक नुस्खों को भी महत्व देना चाहिए। आज रोग प्रति रोधक शक्ति ही किसी देश की ताकत की कसौटी बन गई है। भारत सहित कई देशों के पास खाने-पीने की एक पुरात्तन परंपरा थी। लोग दूध-घी, गुड़-शक्कर और कीटनाशक रहित अनाज, फल, सब्जियों का सेवन करते थे। आजकल कृषि क्षेत्र में कीटनाशक का बड़े स्तर पर प्रयोग होने के कारण जमीन भी विषैली बन गई है, उसकी उपज में ताकत खत्म हो रही है। खानपान के कारण लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। हालात यह बन गए हैं कि बढ़ती बीमारियों के बावजूद हम अपने स्वास्थ्य पर पूरा ध्यान नहीं दे रहे। विशेष तौर पर गरीब देशों को हथियारों की होड़ पीछे छोड़कर मेडिकल, वेंटीलेंटर, ऑक्सीजन और दवाओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है। नर्सों/डॉक्टरों और मेडिकल वैज्ञानिकों की सेना तैयार करने की आवश्यकता है।

 

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