देशव्यापी समस्या बन रहा कूड़ा निपटान

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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में आम लोगों की कॉलोनियों के पास कूड़ा डंप बनाने की सख्त शब्दों में निंदा करते हुए संबंधित अथॉरिटी को फटकार लगाई है। अदालत ने सख्त शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि क्यों नहीं उप राज्यपाल के भवन के सामने कूड़Þा डंप बना दिया जाए। नि:संदेह इस टिप्पणी से सिर्फ दिल्ली के ही नहीं बल्कि पूरे देश के मध्य वर्गीय व गरीबों का दर्द झलकता है। महानगरों से लेकर छोटे-बड़Þे शहरों में कूड़ा समस्या की बजाए आफत बन गया है।

दिल्ली में कूड़े के पहाड़ बनाए जा रहे हैं फिर भी मामले का हल नहीं हो सका। अथॉरिटी ने अपने सिर से बोझ उतारने के लिए कूड़ा डंप आम लोगों की आबादी के नजदीक बना दिए, जिसका लोगों ने विरोध किया। यही हाल पूरे देश का है। प्रशासन कूड़Þा डंप के लिए ऐसी जगह चुनता है जो पास के क्षेत्र से दूर होती है लेकिन नजदीक रहने वाले लोग अधिकारियों को नजर नहीं आते। सत्ता तक पहुंच वाले लोगों से प्रशासन को डर रहता है। आम लोग जिनके पास अपनी रोजी-रोटी से ही फुर्सत नहीं का भी हल नहीं वह धरना-प्रदर्शन के लिए कहां से समय निकाल सकते हैं, अगर विरोध कर जेल चले जाएं तो परिवार को रोटी के लाले पड़ जाते हैं।

प्रशासन इन लोगों की लाचारी का फायदा उठाकर मनमानी करता है। फिर यह मजबूर लोग कूड़े का कहर भयानक बीमारियों के रूप में झेलते हैं। सर गंगा राम अस्पताल के एक सर्वेक्षण मुताबिक दिल्ली की 50 फीसदी आबादी को कैंसर का खतरा है चाहे वह बीड़ी-सिगरेट का सेवन न भी करते हों। राजधानी जो खूबसूरती व सफाई की मिसाल होनी चाहिए वह कूड़े की समस्या से दो-चार हो रही है। पूरे देश के लिए कूड़े के निपटारे संबंधी स्पष्ट व ठोस नीति होनी चाहिए ताकि कोई प्रॉजैक्ट समय पर पूरा हो सके।

प्रशासन की जल्दबाजी के कारण व सही नीतियां न होने के कारण प्रॉजैक्ट विवादों में आ जाते हैं, जिस कारण 6 महीनों में होने वाला कार्य 2-4 वर्ष के लिए लटक जाता है। दिल्ली जैसे महानगरों के लिए ऐसे प्रॉजैक्ट में देरी घातक सिद्ध होगी। छोटे-बड़े शहरों में कूड़ा डंप का विरोध हो रहा है। कहीं न कहीं यह मामले चुनावी मुद्दे बनने लगे हैं। सफाई किसी देश के विकास व तंदरूस्ती की पहली शर्त है व इसके लिए लोगों के स्वास्थ्य व हितों की बलि नहीं ली जा सकती। सरकारें अपनी जिम्मेवारी निभाएं व जनता के स्वास्थ्य का ख्याल रखें। कुछ लोगों का कूड़ा किसी अन्य के लिए बीमारी न बनने दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट की नसीहत से शिक्षा लेनी चाहिए।

 

 

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