आर्थिक मुद्दे राजनीतिक सोच से नहीं निपटते

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नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री ने इस बात को कबूल किया है कि अभी दो अंकों की विकास दर भारत के लिए सपना ही है, जिसके लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। मीटिंग में मुद्दों की बात तो हुई पर कारणों पर विचार करने के लिए जोर नहीं दिया गया। कहनेभर को यह केन्द्र व राज्य की मीटिंग थी लेकिन में एकजुटता नजर नहीं आई। दरअसल अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए चुनावी वायदों व वास्तविकता में बड़ा अंतर है।

जब तक नीतियों को लागू करने के लिए व्यवहारिक जोर नहीं दिया जाता तब तक अच्छे परिणम नहीं मिल सकते। अभी तक सरकारी योजनाएं बेसिर-पैर घूमती हैं। कृषि की दुर्दशा मिटाने को केंद्र द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू की गई है पर इस योजना का फायदा किसानों को कम बीमा कंपनियों को अधिक हुआ। तमिलनाडू के एक किसान को फसल के नुकसान होने पर महज सात रुपए दिए गए।

ऐसी हालत में अर्थव्यवस्था में कृषि के योगदान की उम्मीद कैसे की जा सकती है? बिहार में गठबंधन सरकार ने ही इस योजना को लागू करने से मना कर दिया है। राज्य सरकार व केन्द्र सरकार द्वारा कंपनियों को दिया जा रहा प्रीमियम बीमा कंपनियों के लिए मोटी कमाई बना हुआ है। कई योजनाओं में के न्द्र तथा राज्यों की हिस्सेदारी के लिए कोई योजनाबंदी ही नहीं। उधर दलितों के लिए वजीफा योजना में के न्द्र सरकार का बड़ा हिस्सा है, अचानक केन्द्र सरकार अपना हिस्सा बंद कर देती है बाद में यह योजना राज्य के गले की फांस बन जाती है। ऐसी योजना के लिए ना केन्द्र कुछ देता है ना ही खाली खजाने का सामना कर रही राज्य सरकारें कुछ कर पा रही हैं

। निष्कर्ष के तौर पर योजना सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गई है। आर्थिक मामलों संबंधी राज्यों तथा केन्द्र के बीच सहमति नहीं। कम से कम कृषि प्रधान देश के लिए एक सामूहिक योजना तो बनाई जा सकती है। कर्ज माफी के लिए केन्द्र राज्यों को कोरा जवाब दे चुका है। भाजपा की सरकार वाले राज्य कर्जा माफी की घोषणा करते हैं परंतु केन्द्र भाजपा सरकार ही कर्ज माफी की मांग को वाजिब नहीं मानती। वोट की राजनीति पर तर्क का कोई अर्थ नजर नहीं आ रहा। यदि यह कहा जाए कि अनाज की खरीद को छोड़कर देश में कोई कृषि नीति ही नहीं है, तो गलत नहीं होगा। विकास दर में बढ़ोत्तरी के लिए वोट बैंक की नीति से ऊपर उठ कर कुछ करना होगा। आर्थिक मामलों से राजनीतिक सोच द्वारा निपटना मुश्किल ही नहीं असंभव है।

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