हठ छोड़ किसानों की सुने सरकार

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भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार का हठ कहें या अज्ञानता कि देश में दो महीने से चल रहे शांतिपूर्ण किसान आंदोलन को देश के साथ-साथ दुनिया समझ रही है लेकिन दिल्ली में बैठी भारत सरकार नहीं समझ रही। उल्टे सरकार अप्रत्यक्ष तौर पर अपने साथी तोता मीडिया व फिल्मी सितारों के सहारे इस आंदोलन से निकलने के रास्ते देख रही है जोकि बेहद बचकाने एवं हास्यपद हैं। संयुक्त राष्टÑ महासचिव गुटारेस एवं कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत के किसानों का समर्थन किया है। नरेन्द्र मोदी इस बार गलत फंस गए हैं, हर बार वह इस अड़ियल रवैये से साबित करना चाहते रहे हैं कि भाजपा जो निर्णय एक बार कर लेती है उससे पीछे नहीं हटती, जबकि लोकतांत्रिक देश में, लोकतांत्रिक सरकार पीछे न हटने वाले सिद्धांत से यहां खुद परेशान होती है वहीं देश को भी कई मुसीबतों में झोक देती है।

भारत में आज भी 65 प्रतिशत आबादी कृषि से जुड़ी है, करीब 15 प्रतिशत आबादी कृषि से जुड़े सहायक धंधों से जुड़ी है। इतनी बड़ी आबादी के निर्णय बिना सार्वजनिक चर्चा या बिना संसदीय बहस के लेना पूरी आबादी को परेशान करने वाला है। भारत में यूं तो काफी सालों से केन्द्र सरकारें से इस प्रयास में हैं कि देश की कृषि को संगठित उद्योग में परिवर्तित किया जाए ताकि जनता की मांग के अनुसार फसलों का उत्पादन हो। औद्योगिक कृषि को जगह देने की नीति के चलते कृषि फसलों के भावों के अलावा हर क्षेत्र जैसे सेवा क्षेत्र, उद्योग क्षेत्र में सेवाओं व उत्पादित माल के मूल्यों की वृद्धि की गई ताकि बड़ी आबादी कृषि छोड़ कुछ गैर कृषि क्षेत्रों में स्थान्तरित हो, लेकिन किसान है कि आत्महत्याएं कर रहे हैं परन्तु कृषि नहीं छोड़ पा रहे।

अब भाजपा शायद कॉरपोरेट लॉबी के दबाव में यहां एक ही झटके में किसानों को कृषि से निकालने की भूल कर बैठी है। अभी पारित कृषि बिलों का आमजन को भी सीधा नुक्सान होगा। चूंकि संगठित कृषि में उपज का उत्पादन व मूल्य दोनों ही पंूजीपतियों के हाथों में चले जाते हैं, जिससे आमजन को साधारण अनाज, फल, सब्जी व दूध का बहुत ज्यादा मूल्य चुकाना पड़ेगा। पता नहीं क्यों किसान आंदोलन की अनदेखी कर नरेन्द्र मोदी सरकार आंख मूंदकर हठ कर रही है। किसानों के शांतिपूर्ण आंदोलन को देखते हुए व इसे मिल रहे वैश्विक समर्थन के मद्देनजर भारत सरकार को कृषि बिल वापिस लेकर पुन: किसानों की मांग के अनुसार स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की ओर बढ़ना चाहिए जिससे यहां देश में खुशहाली व समृद्धि आएगी वहीं देश चंद पंूजीपतियों की जागीर बनने से भी बचेगा।

 

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