बेजुबान पशुओें के स्वास्थ्य के प्रति उदासीनता

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रिपोर्ट के अनुसार पशुओें के स्वास्थ्य के प्रति हमारी उदासीनता बेहद चिंता का विषय है। पशुगणना से पता चला है कि समूचे भारत में आवाजाही और खेती में प्रयुक्त होने वाले जानवरों की संख्या तेजी से घटी है। गधे और खच्चरों की आबादी विलुप्तता के एकदम नजदीक जा पहुंची है। दरअसल, अब कोई भी इंसान पालतू जानवर पालना नहीं चाहता। वह जमाना लद चुका है जब इंसानों को बेजुबान जानवरों की जरूरत हुआ करती थी। गौरतलब है आधुनिक युग में शायद अब इंसानों को चारवाहक, आवाजाही व खेती किसानी वाले जानवरों की जरूरत ही नहीं रही।
हिंदुस्तान विगत कुछ वर्षों से पशु सुरक्षा-संरक्षण मामले में दूसरे देशों के मुकाबले काफी पिछड़ा है। पिछले साल की पशुगणना-2019 के मुताबिक कई पालतू जानवर ऐसे हैं जिनकी संख्या देखेरेख के अभाव में कम हुई, जिनमें गधे, घोड़े और खच्चरों की संख्या सबसे ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार पशुओें के स्वास्थ्य के प्रति हमारी उदासीनता बेहद चिंता का विषय है। पशुगणना से पता चला है कि समूचे भारत में आवाजाही और खेती में प्रयुक्त होने वाले जानवरों की संख्या तेजी से घटी है। गधे और खच्चरों की आबादी विलुप्तता के एकदम नजदीक जा पहुंची है। दरअसल, अब कोई भी इंसान पालतू जानवर पालना नहीं चाहता। वह जमाना लद चुका है जब इंसानों को बेजुबान जानवरों की जरूरत हुआ करती थी। गौरतलब है आधुनिक युग में शायद अब इंसानों को चारवाहक, आवाजाही व खेती किसानी वाले जानवरों की जरूरत ही नहीं रही। क्योंकि उनकी जगह पर उनके सामने कई विकल्प मौजूद हैं। गधों से लोग तांगा, बघ्घी आदि खिचवाते थे, उनकी जगह अब ई-रिक्शा आ गए। ईंट-भट्ठों पर ट्रैक्टर ट्रॉलियां आ गईं। इसलिए किसी को जरूरत नहीं?
जानवरों के स्वास्थ्य को दुरूस्त रखना बड़ी चुनौतियां हैं। चिकित्सीय सुविधाओं का अभाव है। प्राचीन समय में भैंस, बैल, और गधों की आवश्यकताओं को कोई नहीं नकारता था। खेतीबाड़ी करना हो, या फिर एक जगह से दूसरे जगहों पर आनाजाना हो, ईट-भट्टों में ईटों की ठुलाई करनी हो, धोबीघाटों से कपड़ों को लाना-ले जाना हो, सभी में इन्हीं जानवरों का इस्तेमाल हुआ करता था। लेकिन आधुनिक वाहनों के उदय के बाद मालवाहक जानवरों के राहों में कांटे ही बिछ गए। बेजुबान पशुओं के रखरखाव और उनकी सेहत के प्रति मौजूदा समय की भौगोलिक परिस्थितियों में खासा बदल आ चुका है। समाज ने जब से पशुधनों को नकारना शुरू किया तभी से तमाम किस्म के पशुओं की प्रजातियां भी लुप्त हो गई हैं। हिंदुस्तान जैसे-जैसे आर्थिक रूप से मजबूत हुआ, वैसे ही पालतू और दुधारू जानवरों से दूर हो गया। दूधारू जानवरों की जरूरतों की भरपाई पैकेटबंद दूध ने पूरी कर दी, तो वहीं आधुनिक मशीनों ने खेती-किसानी में प्रयोग होने वाले भैंस-बैलों आदि जानवरों की जरूरत को नकार दिया।
कुलमिलाकर इंसानों को अब बेजुबान जानवरों की कतई आवश्यकता नहीं? समाज से जब ऐसी तस्वीर पशु चिकित्सों और सरकारी सिस्टम ने देखी, तो उन्होंने भी अपना नजरिया बदलने में देरी नहीं की? आज सच्चाई ये है, एक बीमार पशु खूंटी से बंधा-बंधा मर ही क्यों न जाए, उसके ईलाज के लिए पशु चिकित्सक खोजने से भी नहीं मिलता। ईलाज के लिए दवाईंया भी नहीं मिलती। ज्यादा नहीं, अगर बीते एक दशक पीछे की बात करें, तो देशभर के मेडिकल कालेजों में हजारों की संख्या में चिकित्सीय शिक्षा के छात्र प्रवेश लेते हैं, पर उसमें पशु चिकित्सक कोई नहीं बनना चाहता।
आज विश्व पशु चिकित्सा दिवस है, जिसे मनाने का मकसद मात्र इतना होता है कि बेजुबान पशुओं के भीतर पाए जाने वाले जीवाणुओं का दवाओं के प्रति प्रतिरोध के बारे में जागरूकता फैलाना। कमोबेश, ऐसा हो नहीं पा रहा। कुछ वर्षों में जानवर अनजानी तमाम बीमारियों और वायरसों से दम तोड़ते आ रहे हैं। कारण, चिकित्सा तंत्र का इस ओर मुकम्मल ध्यान नहीं देना? गांवों में जैसे-जैसे दुधारू पशुओं की आबादी कम हो रही है, वैसे ही गांव-कस्बों में पशु अस्पताल कम होते जा रहे हैं। देशभर के ज्यादातर गांवों में इस वक्त पशु चिकित्सा नहीं हैं। गांवों से दूर शहरों में अस्पताल हैं भी तो वहां कोई जाता नहीं? इसलिए बीमार होने पर जानवरों को लोग राम भरोसे छोड़ देते हैं। इसी बेरूखी के चलते जानवर अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। अब कायदे से कोई भी पालतू जानवरों की देखरेख नहीं करता।
गौरतलब है, इंसानों के लिए जिस तरह नित नई वैक्सिीनों की खोज हमारे वैज्ञानिक करते हैं उसी तरह से जानवरों के लिए भी होनी चाहिए, लेकिन नहीं की जाती। आधुनिक खोजयुक्त वैक्सीन और टीके पशुओं की मर्ज निवारक पशु चिकित्सा के लिए टीकाकरण एक आवश्यक उपकरण है, पशु स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देता है और कई जूनोटिक रोगजनकों के जोखिम को कम करता है। ऐतिहासिक रूप से, टीकाकरण प्रथाओं और टीकाकरण प्रोटोकॉल ने कई जीवन-धमकाने वाले रोगों की व्यापकता को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यूपी के बरेली स्थित पशु चिकित्सकों के लिए प्रसिद्व आईवीआरआई एक विशाल ऐसी संस्था है जहां जानवरों के मर्जों पर रिसर्च होता है। लेकिन, अब वहां भी वैज्ञानिकोें की कमी है। पशु आबादी जैसे-जैसे कम हुई, आईवीआरआई की जरूरत भी कम होती जा रही है। पशु-संरक्षण मसले पर समाज और सरकारों को नऐ सिरे से सोचने की जरूरत है। उनके रहन-सहन, स्वास्थ्य संबंधी आदि चीजों को फिर से विस्तार देना होगा। राजा-महाराजाओं के जमाने में बेजुबान जानवरों का प्रयोग होता आया है, वह परंपरा आज तक जिंदा रही। पर, विगत कुछ वर्षों से इंसानों ने जानवरों की जरूरतों को पूरी तरह से नकार दिया, जो इनके कम होने का मुख्य कारण है।
पिछले वर्ष की पशुगणना में कुछ जानवरों की आबादी खत्म होने के कगार पर बताई गई है जिनमें गधे, घोड़े और खच्चर प्रमुख हैं। हिंदुस्तान में गंधों की घटी आबादी के पीछे एक और कारण निकलकर आया है। वह है पशु तस्करी? इंटरनेशनल बाजारों में गधों की खाल की भारी डिमांड रहती है। चाइना जैसे बड़े मुल्कों में गधों की खाल का इस्तेमाल पारंपरिक दवाएं बनाने में किया जाता है। जहां मौजूदा समय में खाल पर आयात पांच फीसद से बढ़कर पच्चीस प्रतिशत हो गया है। वहां गधों की खालों की भारी मांग रहती है। इसी कारण पाकिस्तान में गधों की संख्या शून्य तक जा पहुंची है वहां के लोग चीन में गधों की खाल बेचते हैं। मीडिया रिपोर्टस् के मुताबिक वहां गधे की खाल से बनने वाले जिलेटिन की मांग बहुत ज्यादा है। इसलिए वहां गधों के जिस्म का सौदा खुलेआम होने लगा है?
वर्तमान युवा पीढ़ी की बात करें तो वह पारंपरिक कई जानवरों के दीदार से भी महरूम है। बच्चों को तो ये भी नहीं पता दूध आता कहां से है। वे जानवरों का जैसे दूध पीना ही भूल गए हों। सिर्फ पैकेट बंद दूध ही उनको भाता है। आज की युवा पीढ़ी ने शत-प्रतिशत पालतू जानवरों से दूरी बना ली है। गांवों में अब एकाध घरों में ही पालतू जानवर बंधे दिखाई पड़ते हैं। उसकी भी एक वजह है, आवासीय जगहों का कम होना। दरअसल अब इंसानों के रहने के लिए तो जगह बची नहीं है तो जानवरों को कैसे जगह मिलेगी। पशुओं की घटती संख्या एकाध दशकों से चिंता का विषय बनी हुई है। बावजूद इसके केंद्र और राज्य सरकारें किसी का इस ओर ध्यान नहीं जा रहा। पशु नस्ल सुधार की दिशा में कोई कार्य नहीं होने से ही पशुओं की संख्या में लगातार कमी होती जा रही है। पिछले बीस वर्षों में हर किस्म के पशुओं की संख्या तेजी से घटी है। इससे दुग्ध उत्पादन भी कम हुआ है। गोबर-खाद् की कमी से प्राकृतिक खाद खेतों तक नहीं पहुंच पाती। इसी कारण रासायनिक खादों का प्रयोग बढ़ा है। पशु पालन हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है। इसी बचाने के लिए सरकारों के साथ-साथ हम सबको आगे आना होगा। जानवरों की सेहत के प्रति हमें सचेत होना होगा तभी उनका जीवन हम बचा पाएंगे।
डॉ. रमेश ठाकुर
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