प्रेरणास्त्रोत: गुरु नानक की करुणा

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गुरु नानक देव अपनी मंडली के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्होंंने देखा कि एक बड़ी हवेली पर सात झंडे लहरा रहे हैं। जिज्ञासा जागृत हुई। उन्होंने शिष्यों से पूछा- यह हवेली किसकी है? इस पर लगे हुए सात झंडों का क्या आशय है? शिष्यों ने बताया- ‘‘यह एक लखपति सेठ की हवेली है। जब व्यापार में उसे एक लाख का लाभ होता है तो वह हवेली पर एक झंडा लगा देता है। ऐसा लगता है कि उसने सात लाख रुपये की सम्पत्ति इकट्ठी कर ली है।’’ गुरु नानक जी उस हवेली में जा पहुँचे। सेठ को पता चला तो वह गुरुदेव के पास आया और उनसे भीतर पधारने का अनुरोध करने लगा। गुरुदेव बोले- अभी तो समय नहीं है सेठ, काफी दूर जाना है।

हमारे पास एक सोने की सुर्इं है, रास्ते में उसे डाकू न लूट लें, इसलिए हम चाहते हैं कि इस सुर्इं को आप अपने पास सुरक्षित रख लें। अगले जन्म में हमें आप लौटा देना। इस जन्म में क्या पता, आपसे फिर मिलना हो या न हो। सेठ ने आश्चर्य का पार न रहा। हाथ जोड़कर बोला- ‘‘गुरुदेव! आप क्या कह रहे हैं? परलोक में तो मनुष्य कुछ भी नहीं ले जा सकता। सब यहीं का यहीं धरा रह जाता है।’’

गुरुनानक ने कहा- ‘‘जब आप झंडे लगाकर सात लाख रुपए की सम्पत्ति को परलोक में साथ ले जाने का दावा कर रहे हैं तब मेरी सुर्इं में भला क्य वजन है। इसे भी साथ ले जाना बड़ा उपकार होगा।’’ सेठ के अंतर्मन के ज्ञान-चक्षु खुल गए। अहं का नशा और धन का लोभ एक पल में काफूर हो गया। वह नानक देव के चरणों में गिर पड़ा और बोला- ‘‘गुरुदेव! आपने मुझे सत्य का ज्ञान करा दिया। यह परिग्रह तो मूर्च्छा है, अज्ञान है। आप धन्य हैं, आपकी वाणी ने मुझे जाग्रत कर दिया।’’

 

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