शिक्षा क्षेत्र में चुनौतियों का हो समाधान

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कोरोना के कारण पिछले डेढ़ साल से बंद पड़े उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा मंत्रालय द्वारा घोषित वर्ष 2021 की रैंकिंग से चर्चा का माहौल गरम हो गया है। 2016 से शुरू हुई इस रैंकिंग में 11 श्रेणियों, यथा विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, इंजीनियरिंग, प्रबंध, विधि, फार्मेसी, चिकित्सा आदि विषयों के श्रेष्ठतम संस्थानों की सूची जारी की गई है। वर्ष 2021 की रैंकिंग में श्रेष्ठतम विश्वविद्यालयों की सूची में आईआईटी, मद्रास व आईआईएससी, बेंगलुरु प्रथम और द्वितीय स्थान पर रहे। तीन अन्य आईआईटी (मुंबई, दिल्ली और कानपुर) प्रथम पांच संस्थानों की सूची में रखे गए। निश्चित रूप से एनआईआरएफ को विश्वस्तरीय रैंकिंग बनाने से भारत की बौद्धिक एवं अकादमिक प्रभुता को विश्व स्तर पर स्थापित करने में मदद मिलेगी। क्या इन सूचियों द्वारा हम अपनी उच्च शिक्षा को विश्व स्तरीय बना पा रहे हैं? क्या इस समूची प्रक्रिया में भारत के 90 प्रतिशत औसत दर्जे के संस्थानों को भी मौका मिल पाएगा? साल 2016 में पहली बार शुरू की गई रैंकिंग में राष्ट्रीय स्तर की 11 श्रेणियां बनाई गई थीं।

इन श्रेणियों में की गई रैंकिंग से ताकतवर संस्थानों को और ताकतवर बनाने में तो मदद मिल रही है, किंतु वे संस्थान पिछड़ते जा रहे हैं, जो साधन-संपन्न नहीं हैं। भारत जैसे देश में उच्च शिक्षा की एक बड़ी भूमिका पिछड़े क्षेत्रों के युवाओं को बड़े अवसर देने की रही है। क्षेत्रीय स्तर पर ऐसे कई कॉलेज व यूनिवर्सिटियां मिल जाएंगी, जहां से निकले युवाओं ने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम क्षेत्रों में अपनी धाक जमाई। मिसाल के तौर पर, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जिन कॉलेजों में पढ़े, उनका नाम आप इन सूचियों में शायद नहीं खोज पाएंगे। विश्व स्तर पर और देश में भी अनेक नामी कंपनियों में उच्च पदों पर काम कर रहे भारतीयों में अधिकांश वे हैं, जो आईआईटी और आईआईएम में नहीं पढ़े थे।

यह एक मिथक है कि प्रतिभा सिर्फ शिखर संस्थानों में ही मिलती है। भारत में रिसर्च या शोध शिक्षण संस्थानों की जरूरत है, किंतु ऐसे संस्थान 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होंगे। हमारे देश के 90 प्रतिशत कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षण प्रधान हैं या वे रोजगारपरक शिक्षा देते हैं। इन संस्थानों के शिक्षकों और विद्यार्थियों से शोधकार्य करने एवं शोध पत्र प्रकाशित करने की अपेक्षा करना फिलहाल तो मृग-मरीचिका ही होगी। हमें शिक्षा मंत्रालय से आशा करनी चाहिए कि कोविड काल की जमीनी सच्चाइयों को ध्यान में रखते हुए और एनआईआरएफ की भावी संरचना और श्रेणियों पर एक राष्ट्रीय सहमति बनाते हुए इसका एक नया रूप बनाया जाए, जो अगले दशकों में हमारे देश की चुनौतियों और संभावनाओं के अनुरूप हो।

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