ईलाज के फर्जी दावों पर हो सख्त कार्रवाई
कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुई, जिसमें एक डॉक्टर दावा कर रहा है कि उसने कोरोना के एक मरीज को पांच मिनट पहले होम्योपैथी की एक दवा दी और उसका आक्सीजन स्तर सुधर गया। उस वीडियो के बाद कई मरीजों के पारिवारिक सदस्य उसी दवा के लिए बाजारों में भागदौड़ करने लगे। रिजल्ट यह निकला कि उस दवा का कोई असर नहीं दिखा। ऐसी वीडीयोज से मरीज व उनके परिवारजन न केवल परेशान होते हैं बल्कि पैसा भी बर्बाद करते हैं। हैरानी तो इस बात की है कि इस प्रकार की अफवाहों पर शिकंजा कसने के लिए सरकार के भी कुछ खास प्रयास नहीं नजर आ रहे। सरकारों का ध्यान केवल आॅक्सीजन, वैक्सीन और अस्पतालों में बैडों की कमी पर केंद्रित है, लेकिन जागरूकता भी बेहद आवश्यक है।
यदि लोग जागरूक होंगे तब इलाज बिना किसी देरी, सस्ता व बिना किसी खतरे से होगा। अज्ञानता के कारण अफवाहों में फंसकर लोगों का समय बर्बाद होता है और मरीज अस्पताल तब पहुंच रहा है जब उसकी तबियत बिगड़ जाती है। इस संकट के दौर में कुछ चर्चित दवा कंपनियां पैसा कमाने के लिए दवाओं से संंबंधित कानूनों और प्रोटोकॉल की भी परवाह नहीं कर रहीं। हैरानी तो तब हो गई जब आयुर्वैदिक दवाएं तैयार करने वाली एक बड़ी कंपनी ने पहले कोरोना की दवा तैयार करने का दावा कर दिया लेकिन वास्तविक्ता सामने आने पर शब्दों के तकनीकी हेरफेर से अपना पल्ला झाड़ लिया।
फिर भी यह कंपनी ज्यादा देर चुप नहीं बैठी और कुछ महीनों बाद फिर एक अन्य दवा लांच कर दी और यह भी दावा किया कि इस दवा को विश्व स्वास्थ्य संगठन की मंजूरी मिल चुकी है। समाचार आने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस दावे को खारिज किया कि उसने ऐसी किसी दवा को सर्टीफिकेट नहीं दिया। यह कंपनी इतनी तेजी से चतुराई दिखा गई कि दवा लांच करने के समारोह में केंद्रीय मंत्रियों की उपस्थिति करवाकर लोगों को धोखा दे गई। आखिर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने ऐसे समारोहों में मंत्रियों की उपस्थिति पर सवाल उठाए। इसके बावजूद कंपनी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। लोगों के स्वास्थ्य के साथ धोखा करना बड़ा नैतिक व कानूनी अपराध है। सरकारें इस मामले में सख्त व तत्काल कदम उठाएं ताकि लोगों के आर्थिक, स्वास्थ्य एवं जीवन का नुक्सान न हो।
अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।