Anti-drug Campaign: नशामुक्त युवा ही विकसित भारत की मजबूत नींव, स्वस्थ समाज निर्माण के लिए जरूरी जनभागीदारी
नशे के जाल से युवाओं को बचाने की राष्ट्रीय पहल
Drug-free youth campaign: किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी पर निर्भर करता है। यदि युवा स्वस्थ, जागरूक और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ते हैं तो देश प्रगति के नए आयाम स्थापित करता है। दूसरी ओर नशीले पदार्थों की बढ़ती लत युवाओं के स्वास्थ्य, परिवार, समाज और राष्ट्रीय विकास के लिए गंभीर चुनौती बन जाती है। इसी चुनौती से निपटने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने देशव्यापी ‘नशा मुक्त युवा, विकसित भारत संकल्प अभियान’ प्रारंभ किया है। इस अभियान का लक्ष्य युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करना और समाज में जनजागरण का वातावरण तैयार करना है। Anti-drug Campaign
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभियान के शुभारंभ पर अपने संदेश में कहा कि जो युवा नशे की गिरफ्त से बाहर निकलते हैं, वे साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति के प्रतीक हैं। ऐसे युवाओं को समाज में सम्मान मिलना चाहिए ताकि अन्य लोग भी उनसे प्रेरणा ले सकें। उन्होंने यह भी कहा कि विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब देश का युवा शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से स्वस्थ रहेगा। अभियान के अंतर्गत 100 सप्ताह तक प्रत्येक रविवार को देशभर में विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें खेल, योग, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, संवाद, चित्रकला प्रतियोगिताएं और जनजागरण गतिविधियां शामिल हैं।
नशे की समस्या किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती। इसका दुष्प्रभाव परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है। नशीले पदार्थों की लत शिक्षा, रोजगार, सामाजिक संबंध और आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल असर डालती है। अनेक परिवार इस कारण टूट जाते हैं और युवाओं का उज्ज्वल भविष्य अंधकारमय हो जाता है। Anti-drug Campaign
इसलिए नशामुक्ति का अभियान केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। इस अभियान में अनेक सामाजिक, धार्मिक तथा स्वयंसेवी संस्थाएं भी सहयोग कर रही हैं। विभिन्न संगठन अपने-अपने स्तर पर जनजागरण, परामर्श और पुनर्वास से जुड़े कार्यक्रम चला रहे हैं। समाज की सक्रिय भागीदारी से ऐसे प्रयास अधिक प्रभावी बन सकते हैं, क्योंकि नशे की समस्या का समाधान कानून के साथ-साथ सामाजिक सहयोग और पारिवारिक जागरूकता से भी संभव है।
नशीले पदार्थों की तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए केंद्रीय एजेंसियां लगातार कार्रवाई कर रही हैं। स्वापक नियंत्रण ब्यूरो तथा अन्य सुरक्षा एजेंसियां अंतरराष्ट्रीय तस्करी के अनेक मामलों का पदार्फाश कर चुकी हैं। सरकार के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं और संगठित गिरोहों के विरुद्ध अभियान तेज हुआ है। Anti-drug Campaign
सीमावर्ती क्षेत्रों, समुद्री मार्गों और हवाई अड्डों पर निगरानी बढ़ाई गई है ताकि तस्करी के नेटवर्क को कमजोर किया जा सके। भारत की भौगोलिक स्थिति भी इस चुनौती को जटिल बनाती है। पाकिस्तान, म्यांमार और कुछ अन्य पड़ोसी क्षेत्रों से तस्करी के प्रयास समय-समय पर सामने आते रहे हैं। सीमाओं के साथ समुद्री मार्गों का भी दुरुपयोग किया जाता है। सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता के बावजूद तस्कर नए तरीके अपनाने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि प्रभावी सीमा प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता लगातार बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किशोर अवस्था में नशीले पदार्थों के संपर्क में आने का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में विद्यालयों, महाविद्यालयों और परिवारों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों पर समय रहते ध्यान देना, उन्हें खेल, साहित्य, संगीत और अन्य रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना तथा खुला संवाद बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। समय पर दी गई सही सलाह अनेक युवाओं को नशे की गिरफ्त में जाने से बचा सकती है। Anti-drug Campaign
नशे के विरुद्ध लड़ाई केवल कानून के भरोसे नहीं जीती जा सकती। समाज, परिवार, शिक्षण संस्थान, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, प्रशासन और स्वयं युवा यदि मिलकर कार्य करें तो इस चुनौती का प्रभावी समाधान संभव है। जनजागरण, उपचार, पुनर्वास और कठोर कार्रवाई—इन सभी प्रयासों का संतुलित समन्वय आवश्यक है। नशामुक्त युवा ही आत्मविश्वासी समाज और सशक्त राष्ट्र की आधारशिला बन सकते हैं। यदि प्रत्येक नागरिक इस दिशा में अपनी जिम्मेदारी निभाए, तो स्वस्थ, सुरक्षित और विकसित भारत का लक्ष्य अधिक सशक्त रूप में साकार हो सकेगा।
मृत्युंजय दीक्षित (यह लेखक के अपने विचार हैं)।