आंखें बंद हुईं तो क्या, दो जिंदगियों में उजाला छोड़ गईं माता बलविंदर कौर; डेरा सच्चा सौदा की प्रेरणा से किया नेत्रदान
मरणोपरांत नेत्रदान कर 85 वर्षीय माता ने पेश की मानवता की मिसाल, दो नेत्रहीनों की दुनिया रोशन होने की जगी उम्मीद
पिहोवा (सच कहूँ न्यूज़)। Pehowa News: कहते हैं कि इंसान इस दुनिया से चला जाता है, लेकिन उसके अच्छे कर्म हमेशा उसे लोगों के बीच जीवित रखते हैं। ऐसा ही एक भावुक और प्रेरणादायक उदाहरण हरिगढ़ भोरख निवासी 85 वर्षीय सचखंडवासी माता बलविंदर कौर ने पेश किया। बीमारी के लंबे दौर के बाद सोमवार रात 5 तारीख को उनका निधन हो गया, लेकिन जाते-जाते भी वह दो जरूरतमंद लोगों के जीवन में उजाला करने की उम्मीद छोड़ गईं। माता बलविंदर कौर डेरा सच्चा सौदा की अनुयायी थीं। उन्होंने डेरा सच्चा सौदा द्वारा चलाए जा रहे मानवता भलाई के कार्यों तथा डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी की प्रेरणा से पहले ही मरणोपरांत नेत्रदान का संकल्प लिया हुआ था।
उन्होंने बाकायदा नेत्रदान का फॉर्म भरकर अपनी अंतिम इच्छा परिवार को बता दी थी कि उनके जाने के बाद उनकी आंखें किसी जरूरतमंद के जीवन में रोशनी बनें। माता के निधन के बाद जब परिवार के सामने अंतिम विदाई का समय आया तो भावनाओं के बीच उन्होंने उनकी अंतिम इच्छा को सर्वोपरि रखा। परिजनों ने अपर्णा आई बैंक, अपर्णा रिसर्च एंड चैरिटी ट्रस्ट, मधुबन करनाल से संपर्क किया। आई बैंक की चिकित्सकीय टीम ने पहुंचकर माता की आंखें दान के लिए सुरक्षित कीं। यह क्षण परिवार के लिए निश्चित रूप से बेहद भावुक था। एक तरफ मां को हमेशा के लिए विदा करने का दर्द था, तो दूसरी तरफ इस बात का संतोष भी कि उनकी आंखें किसी ऐसे व्यक्ति की जिंदगी में उजाला ला सकती हैं, जिसने शायद कभी दुनिया को अपनी आंखों से देखने की उम्मीद छोड़ दी हो। माता बलविंदर कौर की आंखें अब दो जरूरतमंद नेत्रहीन व्यक्तियों की दुनिया रोशन करने का माध्यम बनेंगी।
जिस मां की आंखों में जीवनभर अपने परिवार और अपनों के लिए प्यार था, वही आंखें अब किसी अनजान व्यक्ति को दुनिया देखने का अवसर देंगी। यही नेत्रदान की सबसे बड़ी खूबसूरती है—इंसान चला जाता है, लेकिन उसकी आंखों से किसी और की दुनिया बस जाती है। परिवार के सदस्यों ने इस पुनीत कार्य के लिए डेरा सच्चा सौदा, मानवता भलाई की मुहिम और पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मानवता की सेवा और नेत्रदान के लिए मिली प्रेरणा के कारण ही माता ने जीवन रहते यह संकल्प लिया था, जिसे परिवार ने उनकी अंतिम इच्छा मानकर पूरा किया। आई बैंक की टीम ने भी परिवार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि नेत्रदान किसी एक व्यक्ति का जीवन समाप्त होने के बाद दो लोगों के जीवन में नई रोशनी की शुरुआत कर सकता है। यह कार्य समाज के अन्य लोगों को भी नेत्रदान के लिए प्रेरित करने वाला है।
एक मां की अंतिम इच्छा, दो जिंदगियों की नई सुबह
माता बलविंदर कौर की कहानी सिर्फ नेत्रदान की कहानी नहीं, बल्कि यह संदेश है कि हम अपने जाने के बाद भी किसी के जीवन में उम्मीद छोड़ सकते हैं। धन-दौलत और संपत्ति तो पीछे रह जाती है, लेकिन किसी जरूरतमंद को दिखाई देने वाली दुनिया दे जाना ऐसा पुण्य है, जिसकी रोशनी लंबे समय तक कायम रहती है। माता बलविंदर कौर शरीर से भले ही इस दुनिया में नहीं रहीं, लेकिन उनकी आंखों से जब दो लोग फिर से दुनिया देखेंगे, तो उनकी यादें हमेशा उन आंखों की रोशनी में जिंदा रहेंगी। इस मौके पर सच्चेनम्र सेवादार जिंदर इंसां, लाभ सिंह इंसां, बलजीत सिंह, सलिंद्र कुमार, मनोज कुमार, बीरा राम, मुख्त्यार सिंह, संगम सैनी, बलराज सिंह, रोबिन गर्ग, रेनू बाला, सोनिया, नीलम मौजूद रही l