चरित्र ही भावी देश का आधार

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देश की खेल संस्थाओं में चरित्रहीनता की चर्चा चिंताजनक है। पहलवानों ने कुश्ती फेडरेशन के पदाधिकारियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। फेडरेशन के सहायक सचिव को बर्खास्त कर दिया गया है व फेडरेशन के सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं। दूसरी तरफ एक मेडिकल कॉलेज की छात्राओं ने ओटी अध्यापक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। चरित्रहीनता खेल या शिक्षण संस्थाओं के रास्ते में बड़ी बाधा हैं। बेटियों के लिए सुरक्षित व विश्वसनीय माहौल का निर्माण होना आवश्यक है। यदि माहौल बेहतर होगा तब बेटियां शिक्षा व खेलों में आगे बढ़ेंगी। वास्तव में चरित्र ही हमारी संस्कृति का सबसे बड़ा तोहफा है। चरित्रवान लोग ही आगे बढ़ सकते हैं।

चरित्र को धर्मों ने मनुष्य का वास्तविक्त गहना माना है। कोई भी प्राप्ति चरित्र से बड़ी नहीं हो सकती। खेल केवल पदक प्राप्त करने या पुरस्कार प्राप्त करने का नाम नहीं। खेल मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं। प्रत्येक खिलाड़ी या पदाधिकारी का चरित्रवान होना अनिवार्य है। खेलों में यदि बेहतर माहौल होगा तब लड़कियां बेखौफ होकर खेलों में भाग लेंगी व अभिभावक भी उनका हौसला बढ़ाएंगे।

यूं भी ढांचा इस तरह का होना चाहिए कि संस्थाओं में नैतिकता व चरित्र को अहम स्थान दिया जाए। वास्तव में यह अच्छी आदतें हमारे समाज का ही अभिन्न अंग होनी चाहिएं। यदि समाज में बच्चों को शुरू से ही चरित्र व सदाचार की शिक्षा दी जाएगी तब वह बड़े होकर नेक विचारधारा वाले बनेंगे, लेकिन आजकल हो उलट रहा है। बच्चे को इस तरह की शिक्षा व पालन-पोषण दिया जाता है कि वह बड़ा होकर पैसा कमाने वाली मशीन बने, उच्च पद की नौकरी मिले। इस चलन में बच्चों में संस्कारों को बिल्कुल अनदेखा कर दिया जाता है।

बच्चे को दानशील होने, गरीबों का मददगार, निर्दोषों की रक्षा करने वाला व सदाचारी बनने की शिक्षा नहीं दी जाती, न ही शिक्षा ढांचे में ऐसा प्रबंध है व न ही समाज व धर्म की महत्वता बताई जा रही है। वर्तमान परिवेश का ही परिणाम है कि बच्चा बड़ा होकर परोपकारी बनने की बजाए सर्वहारी बन जाता है। इसीलिए आवश्यक है कि यदि शिक्षा व खेल प्रबंधों सहित अन्य क्षेत्रों में सुरक्षित माहौल पैदा हो तब चरित्र निर्माण पर जोर देना होगा। चरित्र निर्माण की शुरुआत परिवार से लेकर समाज से जुड़ी होनी चाहिए। समाज को धर्मों की उच्च शिक्षा के साथ जोड़ने का कोई अन्य विकल्प नहीं है।

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