शिक्षा और रोजगार
Emotional Story: अनकही ममता! बिना शब्दों के बना मां-बेटे का रिश्ता
बिलौटे की ममता ने सिखाया प्रेम का अनमोल अर्थ
Emotional Story: हमारे घर में एक बिल्ली रहती थी। पता नहीं वह कहाँ से आई थी, लेकिन धीरे-धीरे वह हमारे घर का ही एक हिस्सा बन गई। गर्मियों में वह सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर सो जाती और सर्दियों में भूसे वाले छप्पर में दुबककर रात बिताती। दिन के समय वह कई घंटों तक न जाने कहाँ गायब रहती। हम कभी उसे खोजने की कोशिश नहीं करते थे, क्योंकि हमें विश्वास था कि शाम होते-होते वह अपने आप लौट आएगी। समय के साथ घर के सभी सदस्यों से उसकी अच्छी पहचान हो गई। हमारा पूरा परिवार उससे प्रेम करने लगा और वह भी हम सभी पर पूरा विश्वास करने लगी। यहाँ तक कि हमारे घर के पालतू पशुओं के साथ भी उसका गहरा लगाव हो गया था। वह कभी गायों के पास बैठती, कभी भैंसों के पास चली जाती और कभी उनके आसपास ही घूमती रहती। Unique Relationship
हमारी भैंसें और गायें सामान्यत: परिवार के उन सदस्यों पर भी आसानी से विश्वास नहीं करती थीं, जो उनकी देखभाल नहीं करते थे। कोई अनजान व्यक्ति पास से गुजरता तो वे उसे मारने के लिए दौड़ पड़ती थीं। लेकिन इस बिल्ली के साथ उनका व्यवहार बिल्कुल अलग था। वह घंटों उनके पास बैठी रहती और वे उसे कुछ नहीं कहती थीं। ऐसा लगता था जैसे उन्होंने भी उसे अपने परिवार का ही सदस्य मान लिया हो। समय बीतता गया और बिल्ली बड़ी हो गई। कुछ समय बाद मुझे लगा कि वह गर्भवती है।
मेरी आशंका सही निकली। कुछ दिनों बाद उसने हमारे भूसे वाले छप्पर में दो बच्चों को जन्म दिया। दोनों सफेद रंग के छोटे-छोटे बिलौटे थे। सर्दियों का मौसम था। दिसंबर-जनवरी का महीना। चारों ओर कड़ाके की ठंड थी। मैं अक्सर उस बिल्ली को अपने दोनों बच्चों को दूध पिलाते हुए देखता था। वह उन्हें अपने शरीर से लगाकर रखती और ठंड से बचाती। माँ और बच्चों के बीच का वह दृश्य अपने आप में ममता की एक सुंदर तस्वीर था। लेकिन एक रात न जाने क्या हुआ।
अगली सुबह मेरी माँ रोज की तरह जल्दी चाय बनाने के लिए उठीं। उन्होंने देखा कि सफेद रंग का एक छोटा-सा बिलौटा हमारे घर के कच्चे चूल्हे के पास बैठा काँप रहा था। वह बहुत कमजोर दिखाई दे रहा था। उसके शरीर में जैसे जान ही नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी माँ किसी कारण से उसे वहाँ छोड़ गई हो। माँ को उस पर दया आ गई। उन्होंने तुरंत चूल्हे में आग जलाई, ताकि उसे गर्माहट मिल सके। चूल्हे की आग से धीरे-धीरे घर में गर्मी फैलने लगी। माँ परिवार के लिए चाय बनाने लगीं। थोड़ी देर में घर के सदस्य अपने-अपने समय पर चाय पीने के लिए आने लगे। माँ ने सभी को उस छोटे बिलौटे के बारे में बताया। Unique Relationship
यह सुनकर मेरी पत्नी कमरे के भीतर गई और बच्चों को दूध पिलाने वाली एक छोटी-सी निप्पल लेकर आई। जब हमारे बच्चे छोटे थे, तब वे इसी निप्पल से दूध पिया करते थे। अब बच्चे बड़े हो चुके थे, इसलिए उसकी आवश्यकता नहीं थी। मेरी पत्नी ने उसे सँभालकर रखा हुआ था। उन्होंने निप्पल को गर्म पानी से अच्छी तरह धोकर साफ किया और माँ को दे दिया। माँ ने उसमें गुनगुना दूध भरा और बिलौटे के मुँह से लगा दिया। वह बहुत भूखा था। उसने दूध को जल्दी-जल्दी पी लिया। उस दिन शायद पहली बार उसे लगा होगा कि वह अकेला नहीं है। उस दिन से एक नया क्रम शुरू हो गया। कई दिनों तक माँ उसे इसी तरह दूध पिलाती रहीं। धीरे-धीरे उसका कमजोर शरीर स्वस्थ होने लगा। उसकी आँखों में चमक लौट आई। कुछ ही समय में वह पहले की तरह चंचल हो गया। अब उसने अपनी माँ की तरह हमारे घर के पशुओं के पास जाना शुरू कर दिया था।
जिस तरह उसकी माँ का पशुओं के साथ गहरा लगाव था, उसी तरह उसका भी उनसे प्रेम हो गया। पशु भी उसे खूब दुलारने लगे। अब न वे उससे डरते थे और न उसे डराते थे। वह कभी उनके पैरों के पास बैठता, कभी उनके आसपास दौड़ता और कभी खेलते-खेलते उनकी पीठ के पास जा पहुँचता। मेरी माँ जब परिवार के लिए दूध गर्म करतीं, तो उसमें से थोड़ा दूध ठंडा करके एक कटोरी में डाल देतीं और बिलौटे को पिला देतीं। धीरे-धीरे वह इतना स्वस्थ हो गया कि उसने दौड़ना-भागना शुरू कर दिया। वह सीढ़ियों पर ऊपर-नीचे दौड़ता, आँगन में खेलता और पशुओं के साथ समय बिताता। हमारे घर की एक ही चारदीवारी के भीतर एक पुराना मकान और एक नई कोठी बनी हुई थी। अब वह कोठी की ओर भी जाने लगा था। वह कोठी की सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर चला जाता और कभी-कभी काफी देर तक वहीं बैठा रहता। लेकिन उसके जीवन में सबसे खास रिश्ता मेरी माँ के साथ बन गया था। Unique Relationship
माँ ने उसके लिए दूध की एक अलग कटोरी रख दी थी। सुबह, दोपहर और शाम—तीनों समय वह उसमें दूध डालकर उसे पिलातीं। उसे किसी आवाज की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। माँ को केवल कटोरी उठानी होती और वह न जाने कहाँ से दौड़ता हुआ उनके पास आ जाता। मैं अक्सर सोचता था कि उसे कैसे पता चलता है कि माँ रसोई में आ गई हैं। माँ उसे पुकारती नहीं थीं। वह हमारी भाषा नहीं समझता था और न ही हम उसकी भाषा जानते थे। फिर भी दोनों के बीच एक अनकहा संवाद बन गया था—दूध की कटोरी की खनक। जैसे ही माँ कटोरी उठातीं, हल्की-सी आवाज होती और वह तुरंत उनके पैरों के पास पहुँच जाता। सुबह चाय बनाते समय भी ऐसा ही होता। माँ जैसे ही उठतीं, बर्तनों की खनक सुनाई देती और वह छप्पर या छत से उतरकर फौरन माँ के पास आ जाता।
मैं सोचता था कि जिन प्राणियों की अपनी भाषा नहीं होती, वे भी अपने प्रिय मनुष्यों के साथ संकेतों की ऐसी दुनिया बना लेते हैं, जिसे केवल वे दोनों समझते हैं। शायद प्रेम के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। एक दिन माँ कुछ दिनों के लिए मेरी बहन के घर चली गईं। उन्हें वहाँ तीन-चार दिन रहना था। माँ के जाते ही वह बिलौटा उदास रहने लगा। घर के सभी सदस्यों ने उसे प्रसन्न करने की कोशिश की। उसके सामने दूध रखा गया। खाने के लिए दूसरी चीजें भी दी गईं। लेकिन उसने कुछ नहीं खाया। उसने दौड़ना और खेलना भी बंद कर दिया। वह पशुओं के पास भी नहीं जाता था। कभी एक जगह बैठा रहता, कभी दरवाजे की ओर देखता। ऐसा लगता था जैसे किसी का इंतजार कर रहा हो। हमने फोन पर माँ को सारी बात बताई। माँ से रहा नहीं गया। वह उसी दिन बहन के घर से वापस लौट आईं।
सुबह लगभग दस बजे माँ घर पहुँचीं। न जाने उस बिलौटे को कैसे पता चला कि माँ आ गई हैं। वह तेजी से दौड़ता हुआ आया और सीधे माँ के पैरों के पास जा पहुँचा। वह उनके पैरों से लिपटने लगा और उन्हें चाटने लगा। माँ सीधे रसोई में चली गईं। उन्होंने उसे गोद में नहीं उठाया, क्योंकि बिलौटे अपने नन्हे पंजों और नुकीले नाखूनों से कभी-कभी खरोंच देते हैं। माँ ने फ्रिज से दूध निकाला, उसे गर्म किया, फिर ठंडा करके कटोरी में डाला और उसके सामने रख दिया। बिलौटे ने सारा दूध पी लिया। मैं यह सब देखकर भीतर तक हैरान था। कुछ देर बाद माँ चारपाई पर बैठ गईं। हम सभी उनसे मिलने लगे। बिलौटा उसी चारपाई के नीचे आकर बैठ गया। काफी देर तक वहीं बैठा रहा। फिर धीरे से बाहर चला गया। शाम होने लगी। माँ रसोई में रोटियाँ बनाने लगीं। बर्तनों की आवाज होने लगी। दूध की कटोरी भी धोई गई। जैसे ही कटोरी की हल्की-सी खनक हुई, बिलौटा तुरंत सीढ़ियों में आ गया।
माँ ने कटोरी में दूध डाला और उसके सामने रख दिया। उसने सारा दूध पी लिया। माँ रोटियाँ सेंकती रहीं और परिवार के सदस्य बारी-बारी से भोजन करते रहे। भोजन करने के बाद मैं रसोई में पड़ी चारपाई पर आराम करने के लिए लेट गया। तभी मेरी नजर सीढ़ियों में बैठे उस बिलौटे पर पड़ी। वह एकटक मेरी माँ को देख रहा था। बहुत देर तक। उसकी आँखों में जैसे कोई बात थी। मैं उसे देखता रहा और अचानक मेरी कल्पना ने उसके मन की भाषा को शब्द दे दिए।
शायद वह माँ से कह रहा था- ‘‘माँ, मुझे इतने दिनों के लिए छोड़कर मत जाया करो। तुम्हारे बिना मेरा मन नहीं लगता। मेरी जन्म देने वाली माँ अब इस दुनिया में नहीं है। अब तुम ही मेरी माँ हो। तुमने मुझे उस समय सँभाला, जब मैं कमजोर और असहाय था। तुमने मुझे गर्मी दी, दूध दिया, भोजन दिया और मुझे जीने का सहारा दिया। यदि आज मैं जीवित हूँ, तो तुम्हारी ममता की वजह से हूँ। मैं तुम्हारे परिवार के बाकी सदस्यों से भी प्रेम करता हूँ। वे भी मुझे बहुत प्यार करते हैं। लेकिन तुम मेरे लिए सबसे अलग हो। तुमने मुझे केवल भोजन नहीं दिया, बल्कि अपनापन दिया है। तुम मेरी जन्म देने वाली माँ नहीं हो, लेकिन मेरे मन ने तुम्हें अपनी माँ मान लिया है।
इसलिए जब कहीं जाओ तो जल्दी लौट आया करो। यदि संभव हो तो मुझे भी अपने साथ ले जाया करो। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।’’ मैं कल्पना की इस दुनिया में इतना डूब गया था कि मुझे लगा जैसे वह सचमुच अपनी आँखों से माँ से बात कर रहा हो। तभी अचानक माँ ने चूल्हे में डालने के लिए लकड़ियाँ जोर से तोड़ीं। लकड़ियों के टूटने की आवाज ने मेरी कल्पना का वह संसार तोड़ दिया। मैंने देखा—बिलौटा धीरे-धीरे उठा और भूसे वाले छप्पर की ओर चला गया। मैं देर तक उसे जाते हुए देखता रहा। उस दिन मुझे महसूस हुआ कि संसार में कुछ रिश्ते रक्त से नहीं बनते, कुछ संबंध भाषा से नहीं जुड़ते और कुछ प्रेम शब्दों के बिना ही जीवन में उतर जाते हैं। शायद उस बिलौटे और मेरी माँ के बीच भी ऐसा ही कोई रिश्ता था—एक अनकही ममता का रिश्ता। क्योंकि सच यही है- प्रेम को बोलने के लिए भाषा की नहीं, केवल संवेदना की आवश्यकता होती है। Unique Relationship
— मास्टर बचित्र सिंह जटाणा