देश में पहली बार ब्लड कैंसर पीड़ित गर्भवती ने स्वस्थ शिशु को दिया जन्म

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  • दुनियाभर में इस तरह के केस बहुत कम
  • चिकित्सकों ने इसे दुर्लभ सर्जरी का दिया नाम
  • गर्भावस्था के 20वें सप्ताह में दी गई कीमोथैरेपी
  • ब्लड कैंसर के इलाज के साथ ही बच्चे का जन्म कराना था चुनौती

संजय कुमार मेहरा
गुरुग्राम। देश में पहली बार एक ब्लड कैंसर पीड़ित महिला ने स्वस्थ शिशु को जन्म दिया है। हालांकि डिलीवरी तक पहुंचने से पहले महिला ने काफी परेशानियां झेलीं। चिकित्सा जगत के साहित्यों और प्रकाशित शोधपत्रों के अनुसार दुनियाभर में इस प्रकार के मामले गिनती के ही हैं। भारत में यह अपनी किस्म का पहला मामला है, जिसमें हॉजकिन्स लिंफोमा (ब्लड कैंसर) के इलाज के दौरान किसी महिला ने गर्भावस्था को सफलतापूर्वक पूरा किया। चिकित्सकों ने इसे दुर्लभ सर्जरी का नाम दिया है।
उपचार की चुनौतियों के बारे में फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफएमआरआई) में गाइनीकोलॉजी विभाग की सीनियर कंसल्टेंट डा. दीप्ति अस्थाना कहती हैं कि शिशु के जीवन को बचाना सबसे बड़ी चुनौती था। एम्नियोटिक फ्लूड के कई दिनों से नहीं होने की वजह से यह काम काफी टेढ़ा था। इस बीच मरीज के शरीर में प्लेटलेट्स कम होने की वजह से किसी और प्रक्रिया के बारे में सोच भी नहीं पा रहे थे। सौभाग्यवश जैसे ही कीमोथेरेपी शुरू हुई, एम्नियोटिक फ्लूड में सुधार होने लगा और शिशु का विकास भी शुरू हो गया।

तपेदिक के उपचार से बिगड़ी हालत

डा. अस्थाना के मुताबिक कैंसर पीड़िता गर्भवती सोफिया को फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में जब लाया गया, तब वह 20 सप्ताह की गर्भवती थीं। उन्हें लगातार तेज बुखार आ रहा था। शुरूआत में उन्हें अलग-अलग अस्पतालों में इलाज के लिए ले जाया गया, जहां एंटीबायोटिक्स उन्हें दी गई। उनका तपेदिक का भी इलाज शुरू किया गया, लेकिन हालत लगातार बिगड़ रही थी। उनके खून में प्लेटलेट्स की संख्या कम हो रही थी। तत्काल प्लेटलेट तथा ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत थी। एफएमआरआई में भर्ती कराने के बाद भी उनके प्लेटलेट्स और हिमोग्लोबिन का स्तर गिरने लगा था। उस समय वे 5 माह के गर्भ से थीं। उनकी लगातार बिगड़ती सेहत के चलते डॉक्टर्स ने उनकी बोन मैरो बायप्सी करवायी, जिसमें किसी तरह की कैंसरकारी कोशिकाएं नहीं पायी गई। यानी कैंसर होने का पता चला।

कीमोथैरेपी से शिशु पर नहीं पड़ा कोई प्रभाव

इस दुर्लभ सर्जरी को करने में फोर्टिस के इंस्टीट्यूट आॅफ ब्लड डिसॉर्डर हिमेटोलॉजी कंसलटेंट डा. मीत प्रीतमचंद कुमार कहते हैं कि जब किमोथैरेपी शुरू की थी, तब मरीज की गर्भावस्था की दूसरी तिमाही चल रही थी। कैंसर में बढ़त के अलावा उनके शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या लगातार गिर रही थी। गर्भावस्था के दौरान हॉजकिन्स लिंफोमा (कैंसर) से पीड़ित होने और कीमोथैरेपी उपचार महिला द्वारा लिया जा रहा था। इस प्रकार के मामलों में या तो गर्भस्थ शिशु का बचता नहीं है या फिर प्रसव के बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। इस मामले में जब मरीज ने एक स्वस्थ शिशु को जन्म दिया, उस समय उनकी तीन चक्रों में कीमोथैरेपी पूरी हो चुकी है। डिलीवरी के बाद उनके कई टैस्ट करवाए, जिनसे यह पता चला कि कीमोथैरेपी से उनके शरीर में कोई साइड इफेक्ट नहीं हुए हैं।

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