ताजा फल न मिलें तो मर जाता है हरियल पक्षी

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ग्रीन पिजन यानी हरियल, कबूतर परिवार का हरे-पीले, स्लेटी-रंग वाला यह बहुत सुंदर पक्षी है। इसकी सीटी जैसी बोली बहुत मीठी होती है। सुंदरता के साथ-साथ इसका मांस नर्म होता है, जिस कारण इसका बेचारे का शिकार भी अधिक होता है। हरियल, पके फल बड़े चाव से खाता है। फल खाते समय यह कलाबाजी करता है। ये पीपल के पेड़ पर बैठना पसंद करता है। साथ ही इसे सभी हरे रंग के पेड़ भी काफी पसंद होते हैं। हरियल की शक्ल कबूतर जैसी होती है। इसका रंग हरा-पीला होता है, इसलिए इसका नाम हरियल पड़ा। इसे अंग्रेजी में ग्रीन पिजन कहते हैं यानी हरा कबूतर। भारत में इसकी पांच-छह प्रजातियां पाई जाती हैं, जो रंग-रूप, स्वभाव में एक-दूसरे से मिलती हैं।

हरियल शाकाहारी होता है

उपजातियां मिलाकर ये 15 किस्म के होते हैं। भारत में हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक और राजस्थान से लेकर पूर्व में असम तक यह देखने को मिलते हैं। हरियल, पतझड़ या सदाबहार जंगलों के पेड़ों को ज्यादा पसंद करता है। सारा जीवन पेड़ों पर ही बिता देता है।

  • इसकी उम्र करीब 26 वर्ष होती है।
  • यह तीस सेंटीमीटर लंबा होता है।
  • इसका ललाट हरा, स्लेटी और पीले रंग का होता है।
  • पंखों का रंग राख जैसा स्लेटी और हरे रंग से मिला होता है, जिसमें सुंदर पीले रंग की धारियां होती हैं। इनमें चमकीला पीलापन होता है।
  • चोंच मोटी और मजबूत होती है।
  • आंखें नीली होती हैं। आंखों के चारों ओर गुलाबी घेरा होता है।
  • टांगें और पैर पीले होते हैं।
  • पूंछ स्लेटी रंग की होती है।
  • हरियल शाकाहारी होता है। इसे फल ही पसंद हैं।
  • पीपल के अलावा यह बड़, गूलर, पीपल, अंजीर के पेड़ों के पत्ते ही खाता है।
  • यह बड़ा खाऊ होता है और ठूंस-ठूंसकर पेट भरता है।

बेर, चिरौंजी और जामुन के फल इसे ज्यादा पसंद हैं। यह पक्षी बहुत शर्मीला होता है। इंसान के आते ही चुप्पी साध लेता है। ऐसा भी कहा जाता है कि यह पक्षी जमीन पर नहीं बैठता है। हरियल, आठ-दस के झुंड में रहता है। बबूल के पेड़ों पर भी इनके घोंसले पाए जाते हैं। इन्हें बड़ी आसानी से पाला जा सकता है, लेकिन इन्हें ताजे फल न मिलें तो ये मर जाते हैं।

 

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