‘‘बेटा, सेवा और सुमिरन करो, टांग मत कटवाना’’

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मेरी टांंग में एक ऐसा रोग लगा कि मुझे दूसरे या तीसरे दिन घुटने के ऊपर से चीरा लगवाकर मवाद (रेशा) निकलवाना पड़ता था। इस बीमारी के कारण मेरी टांग के तीन आॅपरेशन भी हो चुके थे। मैंने दिल्ली और जयपुर के बड़े अस्पतालों में उपचार करवाया। उन डॉक्टरों की राय थी कि टांग कटवानी पड़ेगी नहीं तो यह रोग शरीर के बाकी हिस्से में भी फैल सकता है परंतु मेरे माता-पिता ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। समय बीतता गया। सन् 1980 में एक दिन गांव रेहड़ियां (मुक्तसर) में पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज का सत्संग था। मेरे बापू जी के साथ मैं भी सत्संग सुनने गई और स्टेज के पास जाकर ही बैठ गई। उस समय मैं अपनी टांग की पीड़ा से बहुत ही दु:खी थी।

सत्संग के उपरांत पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों से मिले। मेरे बापू जी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए पूजनीय परम पिता जी को मेरे रोग के बारे में सारी बात कह सुनाई और पूछा कि पिता जी, बतायें कि टांग करवाएं या न। इस पर प्यारे सतगुरू जी ने वचन फरमाए, ‘‘बेटा, सेवा और सुमिरन करो, टांग मत कटवाना।’’ मैं अपने सतगुरू पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के हुक्मानुसार थोड़ी बहुत सेवा और सुमिरन करती रही। कुछ ही दिनों में मेरी टांग बिल्कुल ही ठीक हो गई। मुझे पता ही नहीं चला कि रोग कब खत्म हो गया। मैं अपने प्यारे सतगुरु पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के परोपकारों का बदला जन्मों-जन्मों तक नहीं चुका सकती।
-श्रीमती सुखपाल कौर, मुक्तसर (पंजाब)।

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