मौत पर पाबंदी वाला शहर, आखिर क्यों नहीं मर सकते लोग यहां?

मौत पर पाबंदी वाला शहर, आखिर क्यों नहीं मर सकते लोग यहां?

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दुनिया में जन्म और मृत्यु को प्रकृति का सबसे अटल नियम माना जाता है, लेकिन Longyearbyen नाम की एक जगह ऐसी भी है जहां मरने पर अनोखी सरकारी रोक लागू है। यह शहर Svalbard द्वीप समूह में स्थित है, जो उत्तरी ध्रुव के बेहद करीब बसा हुआ दुनिया के सबसे ठंडे आबादी वाले इलाकों में गिना जाता है।

क्यों लगाया गया यह अजीब कानून?

यह नियम किसी अंधविश्वास की वजह से नहीं, बल्कि विज्ञान से जुड़े गंभीर खतरे के कारण बनाया गया था। यहां की जमीन सालभर जमी रहती है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में परमाफ्रॉस्ट (Permafrost) कहा जाता है। इतनी ठंड पड़ती है कि तापमान कई बार माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है।

इस बर्फीली जमीन में दफनाए गए शव सामान्य तरीके से गलते-सड़ते नहीं हैं। कई दशक पहले वैज्ञानिकों ने यहां के पुराने कब्रिस्तान की जांच की तो पाया कि शव लगभग सुरक्षित अवस्था में मौजूद थे।

स्पैनिश फ्लू ने बढ़ाई चिंता

सबसे ज्यादा डर तब पैदा हुआ जब रिसर्च में पता चला कि साल 1918 की भयानक महामारी Spanish flu pandemic के दौरान दफनाए गए कुछ शवों में वायरस के अंश अब भी मौजूद हो सकते हैं। वैज्ञानिकों को आशंका हुई कि अगर भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग के कारण परमाफ्रॉस्ट पिघला, तो पुराने वायरस और बैक्टीरिया दोबारा सक्रिय होकर बाहर आ सकते हैं।

कब्रिस्तान बन सकता है खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि जमी हुई जमीन के पिघलने पर सदियों पुराने सूक्ष्मजीव वातावरण में फैल सकते हैं। इसी खतरे को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने 1950 के दशक में यहां दफनाने पर लगभग पूरी तरह रोक लगा दी।

गंभीर मरीजों को भेज दिया जाता है बाहर

आज भी अगर कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा बीमार हो जाए या जीवन के अंतिम चरण में पहुंच जाए, तो उसे इलाज और अंतिम समय के लिए नार्वे के मुख्य हिस्से में भेज दिया जाता है। इसी वजह से लोग मजाक में कहते हैं कि यहां “यमराज से पहले फ्लाइट आ जाती है।”

सिर्फ इंसानों पर नहीं, दफनाने पर भी नियंत्रण

असल में यहां “मरना गैरकानूनी” होने का मतलब यह नहीं कि मौत नहीं हो सकती, बल्कि प्रशासन कोशिश करता है कि किसी की मृत्यु शहर में न हो और शवों को यहां दफन न किया जाए। कुछ मामलों में अंतिम संस्कार या दफनाने की प्रक्रिया मुख्य भूमि नार्वे में कराई जाती है। यह अनोखा नियम दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन और वैज्ञानिक खतरे किस तरह इंसानी जिंदगी से जुड़े कानूनों को भी बदल सकते हैं।

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