अकेला बचपन लापरवाह हुए अभिभावक

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तीन महीनों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में 100 के करीब जिंदगीयां मौत के मुंह में जा चुकी हैं। विगत दिनों पंजाब में दो युवक सैल्फी लेने की चक्कर में रेलगाड़Þी की चपेट में आकर अपनी जिंदगी गंवा बैठे। इसी तरह हरियाणा के 10-12 वर्ष की आयु के बच्चे यमुना नदी में नहाने गए व डूब गए।

मृतकों में अधिकतर 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे ही शामिल हैं। गर्मी में नहरों में बच्चों के डूबने की खबरें आम सुनने को मिल रही हैं। ऐसी घटनाएं एक-दो दिन चर्चा में रहकर समय की धूल में खो जाती हैं। सरकारों के लिए यह मुद्दा नहीं सिर्फ अचानक घटित हुई घटनाएं हैं। यह घटनाएं मामूली नहीं बल्कि एक सामाजिक संकट का परिणाम हैं, जिस संबंधी चर्चा नहीं के समान है। दरअसल यह दो पीढ़ियों के मध्य पैदा हुई खाई का परिणाम है, जिस संबंधी न तो समाज जागृत है व न ही इसे रोकने के लिए कोई चर्चा होती है।

अब परिस्थितियां यह बन गई हैं कि बच्चे समाज में अकेले रह गए हैं। अभिभावकों के लाड-प्यार की कमी के चलते वह मोबाईल फोनों पर समय व्यतीत करने लगे हैं। काम-धंधों में उलझे अभिभावकों के पास समय की कमी तो जरूर है लेकिन बच्चों को नजरअंदाज भी किया जा रहा है। अभिभावक बच्चों को समय नहीं दे रहे। नहरों-नदियों में नहाने के लिए बच्चे पहले भी जाते थे लेकिन तब उनके साथ परिवार का कोई समझदार आदमी जरूर होता था।

अब घरों में बंद हुए बच्चे अभिभावकों को कामों में उलझे देख खुद अनजान नदियोंं-नहरों पर जा पहुंचते हैं व नहाने का आनंद लेने के चक्कर में अपनी जिंदगी गंवा बैठते हैं। दूसरी तरफ सैल्फी कल्चर का ऐसा रूझान है कि बच्चे अपनी सुरक्षा की तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रहे। सैकड़Þों बच्चे समुन्द्र में कि श्तियों पर सैल्फी लेते डूब गए। कोई हैडफोन कानों में लगाकर सड़क हादसे या रेल हादसे का शिकार हो गया। मोबाईल फोन ने जरूरत की बजाए एक बीमारी का रूप धारण कर लिया हैै।

कसूर मोबाईल फोन का नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का है जहां अभिभावकों ने अपनी जिम्मेवारी से मुंह मोड़कर बच्चों को मोबाईल के सामने फेंक दिया। सांझे परिवार खत्म हो गए हैं। छोटे परिवार आर्थिक जरूरतों के लिए तंगहाली से जूझ रहे हैं। अमेरिका ने हथियारों की आजादी देकर जो दुख झेले हैं भारत वह मोबाईल के बेजा दुरुपयोग एवं अभिभावकों की लापरवाही के कारण भुगत रहा है। सरकार को इन घटनाओं को देखकर आंखें मूंदने की बजाए बचपन को बचाने के लिए कोई ठोस नीति तैयार करनी चाहिए।

 

 

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