सोने की खान, फिर भी नहीं बनी पहचान
भारत दुनिया की एक बड़ी मंडी है। अमेरिका, चीन सहित अन्य बहुत सारे देश अपना सामान बेचने के लिए भारत की तरफ देखते हैं। पर आम भारतियों में अभी अपने आप को ‘सोन देश’ के वासी होने का अहसास नहीं है।
राष्ट्रीय कलाकारों की दुर्दशा क्यों
यह भी बात नहीं कि देश में कला की संभाल के लिए कोई मार्गदर्शक इतिहास नहीं है। प्राचीन से लेकर मध्यकाल तक कलाकारों/साहित्यकारों को समय के शासकों द्वारा जागीरें देकर सम्मान देने की परंपरा रही है तब पुरुस्कार कम व आवश्यकता की वस्तु जैसे पैसे व जायदाद को अधिक महत्व दिया जाता था।


























