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    वैश्विक संबंधों को पुनर्निर्धारित करने की आवश्यकता

    दिसंबर में भारत को जी20 की अध्यक्षता मिलने के बाद भारतीय राजनीति और सरकार जी-20 के सदस्य देशों के साथ अनेक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रहा है। पूरे वर्ष देश भर में ऐसे कार्यक्रम और समारोह आयोजित किए जाएंगे जो विभिन्न क्षेत्रों में भारत की परिसंपत्तियों का प्रदर्शन करे ताकि विश्व समुदाय का ध्यान उनकी ओर जाए। इस वर्ष के अंत में जी 20 शिखर सम्मेलन से पूर्व लगभग ऐसी 200 बैठकें आयोजित की जाएंगी।

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    जी-20 शिखर सम्मेलन से जुडेÞ यह कार्यक्रम ऐसे समय पर किए जाएंगे जब अगले संसदीय चुनाव होने वाले होंगे और सरकार अगला जनादेश लाने का पूर्ण प्रयास कर रही है। तथापि बहुदलीय लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धी चुनावी राजनीति खेल का अंग है और यह भारत के लिए अच्छा रहेगा क्योंकि भारत घरेलू स्तर और विदेशों में अच्छा प्रदर्शन करेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने वायदा किया है कि आगामी संसदीय चुनाव से पूर्व के इन 396 दिनों में देश के गरीब लेगों के लिए बडेÞ-बडेÞ प्रावधान कए जाएंगे।

    मोदी के नेतृत्व में सरकार ने पिछले नौ सालों में अनेक नए विचार और विभिन्न क्षेत्रों में नई योजनाएं लागू की हैं। इनमें से कुछ अच्छी हैं और विभिन्न आलोचकों की मानें तो कुछ अच्छी नहीं है। विदेश नीति भी मिली जुली रही हैं मैं प्रत्येक सप्ताह इस स्तंभ में इस बारे में लिखता रहता हूं। इस लेख में मैं ऐसा सुझाव देना चाहता हूं जो भारत विशेषकर प्रधानमंत्री को विश्व गुरू के स्तर तक ले जाएं और जिसको प्राप्त करने की वे आकांक्षा भी रखते हैं। विदेश मंत्रालय को भारत की मूल सांस्कृतिक और सभ्यतागत मूल्यों को सामने रखने का अवसर मिला है। भारत ने जी-20 शिखर सम्मेलन 2023 के लिए एक नारा दिया है जो वसुघैव कुटुम्बकम की अवधारणा को दर्शाता है। यह वास्तव में एक शक्तिशाली, भावनात्मक और सामाजिक नैतिक मूल्य है।

    जी-20 समारोह के आयोजकों ने एक संवेदनशील और नैतिक भावना को उजागर किया है जो स्वामी विवेकानंद के उन शब्दों को प्रतिबिंबित करता है जो उन्होंने 1893 में विश्व धर्म संसद में अपने भाषण में विश्व के भाईयों और बहनों कहकर उत्पन्न की थी और जिसने शिकागो के उस सम्मेलन में उपस्थित सभी लोगों की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक भावनाओं को प्रभावित किया था। जी 20 शिखर सम्मेलन के आयोजकों और कर्ता-धतार्ओं को सलाह दी जाती है कि वे एक बार पुन: भारत की आध्यात्मिक, सभ्यतागत और नैतिक मूल्यों का प्रदर्शन करे जो विश्व को बहुप्रतीक्षित विकल्प उपलब्ध करा सके।

    वस्तुत: भारत को नियोजन, प्रंबंधन और शासन में वैश्कि नैतिक मूल्यों का पुनर्निर्धारण करना चाहिए जिसमें जनता को सर्वोच्च स्थान दिया जाए। धार्मिक विश्वासों के अनुसार लोगों की उत्पति भगवान की छवि से हुई है। विश्व में विकास और शासन के वर्तमान सिद्धान्त क्या हैं? वह सिद्धान्त है नैतिकता और मानवीय मूल्यों का ध्यान में रखे बिना संपति जोड़ो और उस संपत्ति की शक्ति का उपयोग किसी देश में नागरिकों को नियंत्रित करने और प्रादेशिक विस्तार तथा आर्थिक और सैन्य वर्चस्व आदि के लिए अन्य देशों के साथ संघर्ष करने के लिए किया जाए।

    नव समृद्ध चीन इस बात का उदाहरण है। चीन ने सामाजिक और नैतिक मूल्यों को सम्मान दिए बिना विकास की अवधारणा को लागू किया है। विश्व द्वारा विशेषकर चीन द्वारा अपनाई गई इस रणनीति के परिणाम भयावह हैं और इसमें से कोविड, जलवायु परिवर्तन के संबंध में हमारे विदेश मंत्री का भी ध्यान गया है। किंतु विकास की इस रणनीति से चीन जैसा दानव पैदा हआ है और इसका कारण पश्चिमी जगत की वे बड़ी कंपनियां हैं जिन्होंने सस्ते तथा बंधुवा चीनी श्रम शक्ति का शोषण करना चाहा।

    इससे अनेक परस्पर विरोधी अवधारणाओं के बारे में विश्व भर में बहस छिडी जिनमें लोकतंत्र और तानाशाही शामिल हैं। नेता लोकतंत्रों की आर्थिक प्रभावशीलता के बारे में संदेह करने लगे हैं और चीन के निरंकुश मॉडल से प्राप्त तथा तथाकथित लाभों की ओर ललचाने लगे हंै। गुणवत्ता और मात्रा के चलते उत्पादन और खपत पर बल दिया जाने लगा तथा वे सौहार्द और खुशहाली पर हावी होने लगे। सकल घरेलू खुशहाली और सकल घरेलू उत्पाद में टकराव देखने को मिला। भौगोलक रूप से चीन और भारत के बीच भूटान जैसे देश में सकल घरेलू खुशहाली अवधारणा को शुरू किया।

    भौतिकवाद और आध्यात्म के बीच टकराव देखने को मिला। आवश्यकता और प्रलोभान के बीच विरोधाभास देखने को मिला और इस संबंध में हमें महात्मा गांधी की इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने कहा था विश्व में सभी की आवश्यकताओं के लिए सब कुछ पर्याप्त है किंतु प्रत्येक के लालच के लिए नहीं है। ऐसी सलाह को नजरंदाज करते हुए पूंजीवादी कंपनियों ने खपत को बढ़ावा दिया जिससे बबार्दी को भी बढ़ावा मिला। इसके साथ प्रकृति और संस्कृत भी जुड़े हुए हैं।

    उत्तर में स्थित देशों तथा चीन द्वारा विकास का जो वर्तमान मॉडल अपनाया जा रहा है उसके चलते प्रकृति का निर्ममता से दोहन किया गया जिसके चलते संसाधनों के लिए संघर्ष हो रहा है और महामारी सहित अनेक जलवायु परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। योजनाकारों ने व्यक्ति की उपेक्षा की और मशीनों पर अधिक ध्यान दिया जिसके चलते अनावश्यक प्रौद्योगिकी खपत बढी और इससे सामाजिक ढांचा बिखरा तथा मानव संवाद बाधित हुआ जो सभी देशों में सामाजिक सौहार्द का आधार है।

    भारत ने वैश्विक मूल्यों को पुनर्निर्धारित करने की पहल की है। वह लोगों पर पुन: ध्यान केन्द्रित कर रहा है, भाईचारे और दया की शक्ति को बढ़ावा दे रहा है जो परिवारों, समुदायों और देशों को एक कर सके। यदि विश्व एक कुटुम्ब है, जैसा कि भारत ने जी 20 के लिए नारा दिया है, वह परिवार भाईचारे से एकजुट रहना चाहिए और वह प्रेम और एकजुटता के सूत्र में रहना चाहिए। क्या ये बातें काल्पनिक और प्रगतिवादी लगती है? इस संबंध में वर्तमान प्रवृति की जांच करनी चाहिए और इस बात का मापन करना चाहिए कि देश और विश्व में लोगों के पास कितनी संपत्ति है। और यदि हम ऐसा करते रहें तो हम शूूमाकर की भविष्यवाणी को सही ठहराएंगे। उन्होंने कहा था कि परंपरागत अर्थशास्त्री टाइटेनिक में डेक चेयर को पुन: व्यवस्थित कर रहे हैं। आशा की जाती है कि गांधी, बुद्ध और शूमाकर के विचारों को दशार्ते हुए भारत उनके विचारों को विश्व समुदाय के हित में जी 20 वर्ष के दौरान चरितार्थ करेगा।
                                             (यह लेखक के अपने विचार हैं) डॉ. डीके गिरी वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार

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