चिट्ठी लिखें व पाएं बेरोक मीडिया कवरेज, साथ में चंदा व सरकारी गनमैन

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यूं तो लोग सदियों से चिट्ठी (Letter) लिखते आ रहे हैं पर वर्ष 1999 से चिट्ठी लिखने की नई कला ने जन्म लिया है। इस कला से कई लोगों ने फुल टाईम करोबार, आठों पहर देश विदेश में चर्चा में रहने के लिए मीडिया कवरेज व सरकारी सुरक्षा हासिल करने तक का अच्छा जुगाड़ कर लिया है। चिट्ठी लिखने की इस कला में महारत रखने वाले ये लोग ज्यादा पढ़े लिखे भी नहीं है लेकिन चिट्ठी गजब की तैयार कर लेते हैं, फिर इनकी चिट्ठी (Letter) इन्हें वह सब देती है जो आजकल में बहुतों की ख्वाहिश रहती है।

नेता, अभिनेता, खिलाड़ी, अफसर, कलाकार जिस सब को पाने के लिए दिन रात मेहनत करते हैं फिर भी वह मनचाहा हासिल नहीं कर पाते, लेकिन ये लोग चिट्ठी लिखकर ही वो सब हासिल कर रहे हैं जिसकी कसक बहुतों के दिलों में ही रह जाती है। विदेशी लोगों से धर्म के नाम पर चंदा, फोकट में केस लड़ने के लिए वकील, बिना चाय नाश्ते का प्रबंध किए मीडिया कवरेज और तो और सरकारी गनमैन वह भी प्रशासन की बांह मरोड़ कर कि देखो जी मुझे जान का खतरा है।

न्यायालय में खड़े होकर चिट्ठी (Letter) लिखारी ऐसे आंसू बहाते हैं कि बेचारी न्यायपालिका का भी रोना निकल जाए। फिर आर्डर पर आर्डर जारी होते हंै और ये लोग गद्गद् करते बाहर आते हैं। फिर सारा दिन फेसबुक, व्हाटसएप व टीवी को टुकर टुकर देखते रहने वाले एकतरफा दिमाग के लोग इन्हें वायरल करते हैं कि देखो यह हैं बहादुरी, अच्छा कोई तो है जो डेरा सच्चा सौदा के खिलाफ लड़ रहा है।

परंतु डेरा से जुडेÞ लोग जानते हैं कि किसी को बस चिट्ठी लिखना आ जाए फिर सीबीआई, पुलिस, कोर्ट कितना पसीना बहाते हैं और लिखने वाले को चिट्ठयां क्या क्या दे सकती हैं वह तो वही जानता है जो चिट्ठी लिखता है या फिर वो जो चिट्ठी का लिखा भुगतता है। सरकार, प्रशासन एजेंसिया ये सब तो चिट्ठी लिखने वालों के बाएं हाथ का टूल हैं।

मेरी सलाह है कि देश में चिट्ठी लिखने का एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान खुले जिनमें खट्टा, गुरदास तूर, विश्वास गुप्ता, चिट्ठी कला की शुरुआत करने वाली ‘साध्वियां’ व खासकर भूपेंद्र गोरा जैसी नामचीन फैकल्टी नियुक्त हो।

प्रकाश सिंह सलवारा

 

 

 

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