आतंकवाद के विरुद्ध लड़ी जाए निर्णायक लड़ाई

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द­क्षिण एशिया में चरमपंथ और आतंवाद को खूब खाद-पानी मिल रहा है। अफगान में तालिबानी की एंट्री के बाद आतंकवाद को ‘सेफ्टी आक्सीजन’ मिल गया है। अफगानिस्तान में तख्तापलट के बाद आतंकवाद के हौसले बुलंद हैं। आतंकवादी संगठन कश्मीर को छोटा तालिबान बनाना चाहते हैं। हालांकि तालिबानी सरकार ने स्पष्ट तौर पर कई बार यह संकेत दिया है कि वह किसी भी देश के अंदरूनी मामले में दखल नहीं करेगा लेकिन फिलहाल ऐसा कुछ दिखता नहीं है। पाकिस्तान में फैली आतंक की नर्सरी कश्मीर में अल्पसंख्य हिन्दुओं और सिखों का कत्ल तालिबानी संस्कृति की एक तरह से लांचिंग है। सवाल उठता है कि कश्मीर क्या कभी अपनी रौ में वापस लौटेगा।

भारत के लिए यह बड़ा सवाल है। अगर हम पंजाब में आतंकवाद को समूल नष्ट कर सकते हैं तो कश्मीर में क्यों नहीं? यह हमारी सत्ता और सरकारों के लिए आत्म विश्लेषण का विषय है। हम सर्जिकल स्ट्राइक की घुड़की देकर आतंकवाद से मुकाबला नहीं कर सकते। हमें सियासी नफे-नुकसान को किनारे रखकर कश्मीर पर निर्णायक फैसला और दृढ़ इच्छा शक्ति दिखाने की जरूरत है। आतंकवाद पर पाकिस्तान को कब तक सहन कहते रहेंगे, यह जानते हुए भी कि वह अपनी आदत से बाज आने वाला नहीं। कश्मीर में आतंकवाद की लड़ाई में कब तक हमारे सैनिक शहीद होते रहेंगे। आतंकवाद के मसले को लेकर यदि पाकिस्तान हमारे लिए चुनौती है तो उसके खिलाफ हमें निर्णय लेने की आवश्यकता है। घाटी में हिंदुओं की हत्या पर कश्मीर के राजनीतिक दल और संगठन चुप्पी साधे हैं।

अतिवाद, कश्मीरियत और उसकी संस्कृति एवं सभ्यता को नंगा कर रहा है। आम कश्मीरी आवाम को इसके लिए लामबंद होना पड़ेगा। आम कश्मीरियों के बीच जो आतंकवादी पनाह बनाए हुए हैं, उस अड्डे को खत्म करना होगा। बांग्लादेश में भी नवरात्र के दौरान पूजा पंडालों पर हमले किए गए। हिंदू मंदिरों को निशाना बनाया गया। इस्कान टेंपल में आतंकवादियों ने हमला कर दिया जिसकी वजह से एक व्यक्ति की मौत हो गई और 200 से अधिक लोग घायल हो गए। जिस बांग्लादेश को कभी भारत ने पाकिस्तान से अलग कर उसे पाकिस्तान के दमन से आजादी दिलाई, आज वही बांग्लादेश भारत के खिलाफ खड़ा दिख रहा है। कश्मीर में हिंदू अल्पसंख्यकों पर आतंकी हमले पूर्व नियोजित हैं।

आतंकवादियों के दिमाग में है कि हिंदू अल्पसंख्यकों एवं सिखों की हत्या कर उन्हें बड़ा फायदा होने वाला है क्योंकि ‘टारगेट किलिंग्स’ से घाटी में एक बार फिर दहशत और भय की वजह से पलायन शुरू हो सकता है। यह पलायन ठीक उसी तरह होगा जिस तरह सालों पूर्व कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ना पड़ा था। कश्मीर के अलगाववादी संगठन, राजनीतिक दल और राजनेता धारा 370 के खात्मे से खुश नहीं है क्योंकि उनकी अघोषित आजादी छिन गई है। घाटी में सेना और हिंदुओं का कत्लेआम कर सीधे हिंदुत्व को चुनौती देने की कोशिश है। अब वक्त आ गया है जब आतंकवाद पर निर्णायक फैसले की जरूरत है।

 

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