कब रूकेगी खाद्य पदार्थों में मिलावट

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सरसा। त्यौहारों का मौसम आरंभ हो गया है तो तरह-तरह की मिठाइयां और पकवान हमारे दैनिक जीवन में बड़ी संख्या में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाएंगे लेकिन पिछले अनेक वर्षों के आंकड़े देखें तो अनेक स्थानों पर मिलावटी खोया पकड़े जाने के समाचार यत्र तत्र दिखाई देंगे। मिलावटी दूध की चर्चा साल भर रहती है। दूध समाज के हर वर्ग की आवश्यकता है। दूध को हम चाय, काफी व पेय के रूप में प्रयोग करते हैं किन्तु मिलावटखोर कृत्रिम दूध बनाकर हमें विभिन्न बीमारियों के घेरे में ला देते हैं। यूरिया, डिटरजेंट, शैम्पू, चीनी व सोडियम वाई काबोर्नेट के प्रयोग से तैयार दूध जहरीला है तो डेयरी मालिक पशुओं को प्रतिबंधित आक्सीटोसिन का इंजेक्शन लगाकर दूध की आखिरी बूंद भी निचोड़ लेना चाहते हैं। ऐसा दूध अनेक प्रकार के गंभीर रोगों का कारण बनता है। इन दिनों पूरे देश में कृषि उत्पादन भी अंधाधुंध रासायनिक खादों और कीटनाशकों के छिड़काव का प्रचलन स्वास्थ्य के लिए एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। कुछ वर्ष पूर्व देश की राजधानी दिल्ली में मिलावटी सरसों के तेल से फैली महामारी के बाद खाद्य पदार्थों में किसी भी प्रकार की मिलावट रोकने के लिए नियम तो जरूर बनाये गए लेकिन इनका पालन कितना हो रहा है, यह जानने की फुर्सत हमारे अफसर और नेताओं को नहीं है वरना तेल, दूध, चीनी और अनाज जैसी रोजमर्रा की वस्तुएं सरेआम बेची जा रही हैं। सब्जियों पर हरा रंग लगाकर लोगों को बेफकूफ बनाने का प्रयास किया जाता है।

आज दालें, अनाज, दूध, घी से लेकर सब्जी और फल तक कोई भी चीज मिलावट से अछूती नहीं है। दूध में मिलावट जांचने के लिए फिलहाल उपलब्ध तकनीक के लिए बड़ा सेट-अप चाहिए और इनका ऐसी डिवाइसों में सूक्ष्म रूप में उपयोग नहीं कर सकते जो एक आम इंसान के लिए सुलभ और सस्ता हो। इसलिए विकासशील देशों के अधिकांश उपभोक्ता मौजूदा तकनीकियों का लाभ नहीं ले सकते। आशा है यह नया सिस्टम कम से कम में मिलावट पर नियंत्रण करने में अपनी भूमिका निभायेगा। यदि खाद्य पदार्थों में मिलावट की नियमित और वैज्ञानिक ढंग से त्वरित जांच में प्रशासनिक सिस्टम भी अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हो जाए तो मिलावट पर नियंत्रण कर अनावश्यक आमंत्रित किए जा रहे अनेक प्रकार के रोगों से बचा जा सकता है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो बढ़ते असाध्य रोगों पर नियंत्रण संभव न हो सकेगा लेकिन यक्ष प्रश्न यह कि ‘बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा, डरे हुए चूहे बांधेंगे या उसके साथ मिलकर मलाई डकारने वाली सरकारी बिल्लियां?

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