गौरक्षा को बनाया जाए सामाजिक मुद्दा

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गौवंश से होने वाले हादसों का मामला सच में ही गम्भीर है और इस पर विचार होना जरूरी भी है। जहां सड़कों पर घूमता बेपनाह गौवंश परेशानी का सबब है वहीं गौशालाओं में भी बीमारी की मार झेल रहा है। ऐसी हालत में आखिर पशु क्या करें।गौवंश को अवारा कह कर पुकारने वालो से मैं एक सवाल करना चाहता हूं कि इनकी इस हालत का जिम्मेवार कौन है? गांवो से शहर में धकेल दिये गये इस गौवंश को कौन सम्भाले यह एक बड़ा सवाल है। हादसों के बाद ठीकरा प्रशासन के सिर पर फूटता है, क्योंकि या तो यह किसी हादसे का शिकार होते हैं या इनके करण कोई हादसे का शिकार होता हैं। हरियाणा के हर बाजार में 20 से 30 के झुण्ड में घूम रहे इस गौवंश की पनाह का स्थाई हल ढूंढना होगा।

हर शहर व आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी संख्या 2000 तक भी हो सकती है, ऐसा भी अनुमान है। अगर यह अनुमान ठीक है तो 50000 से 100000 बेपनाह पशु हरियाणा की सड़कों पर हैं। बेपनाह पशु तो एक समस्या है, पर उनकी लगातार बढ़ती संख्या इस समस्या को और उलझाती जा रही है। ज्ञात रहे कि ये जंगल में अपनी संख्या नहीं बढ़ा रहे, गोपालक जो आप और हम है, इस बढ़ती हुई जनसंख्या के जिम्मेदार है। गौपालक गौवंश का पालन करते और दूध पीने के लालच में पहले बछड़ों को घर से बाहर धकेल देते हैं और दूध पीकर गाय को धकेल देते है। नन्दियों की संख्या शहरों में बढ़ती जा रही है, क्योंकि गांव में जब ये खेतों का नुक्सान करते लोग इन्हें शहरों और मण्डियों में धकेल देते है। कैसी मूर्खता है नील गाय, हिरण, खरगोश जैसे वन्य जीव सैकड़ों की संख्या में विचरण करते हैं।

उन पर हमारा कोई जोर नहीं, पर गौवंश को हम अपनी हदों से बाहर धकेल देते हैं।इस समस्या का हल इन्हें गौशालाओं में बंद करने से नहीं होगा, इन्हें अपनाने की सोच से आयेगा। अगर हर मन्दिर, हर गांव, हर बड़ा जमींदार एक गौवंश को अपना ले तो यह बेपनाह सड़कों से हटकर सम्मान सहित जीवन जी लेंगे, दूसरी ओर पशुपालन विकास अगर तुरन्त प्रभाव से गौपालकों की शिनाख्त करे और गौवंश के जन्म पर उनका रिकार्ड रखे, गायब होने पर जवाब-तलब करे तो वह दिन दूर नहीं जब समस्या का हल हो जायेगा।

इसके साथ हो गौवंश के मलमूत्र से होने वाले लाभ पर हर गांव में स्वास्थ्य चर्चा हो। ग्रामीणों को कम्पोस्ट बनाना सिखाया जाए, तो लोग गौवंश को घरों से बाहर नहीं धकेलेंगे। क्योंकि अधिकतर गौवंश को बाहर इसलिए धकेल दिया जाता है, क्योंकि दूध की कमी के कारण उनसे कोई आर्थिक लाभ नजर नहीं आता और लोग उसे बोझ समझने लगते हैं। अगर गौवंश से होने वाले लाभ की जानकारी लोगों तक पहुंचे तो वह इन्हें जरूर अपनाएंगे। सरकार व सामाजिक संगठनों को चाहिए कि जीवन दायिनी गाय पर चर्चा आरम्भ करें और गौरक्षा को एक सामाजिक मुद्दा बनाये और ऐसे प्रयास किए जायें कि लोग जान सके कि गाय एक सस्ता सुलभ स्वस्थदायिक जीव है। आओ सब मिलकर प्रयास करें,गौवंश पर लगे आवारा के धब्बे को,मिटाकर अपनाने का प्रयास करे,जब कभी ‘‘कल’’ हमसे पूछेगा,मानव रक्षक गौ कहा गई,तब क्या कहोगे कल से,हम निष्ठुर थे इतने कि,सड़के ’माँ’ को खा गई,हम चुपचाप देखते रहे,माँ तो अपना फर्ज निभा गई।

-लेखक आशीष सिंह

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