Agriculture News: खरीफ फसलों में बढ़ा रस चूसक कीटों का खतरा, जानें बचाव के प्रभावी उपाय

रस चूसक कीट की कैसे करें पहचान, जानें आईपीएम तकनीक और विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण सलाह

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डॉ. संदीप सिंहमार
Kharif Crop protection: खरीफ सीजन में मौसम का बदलता मिजाज किसानों के लिए नई चुनौती बन गया है। बारिश के बाद बढ़ी नमी और तापमान में उतार-चढ़ाव ने मूंग और कपास जैसी फसलों में रस चूसक कीटों की गतिविधि तेज कर दी है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खेतों की नियमित निगरानी नहीं की गई तो शुरूआती संक्रमण आगे चलकर बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। Agriculture News

विशेषज्ञ दिनेश जाखड़ के अनुसार, मूंग की फसल में सफेद मक्खी और अन्य कीट अधिक सक्रिय हैं। ये पत्तियों से रस चूसकर पौधों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं, जिससे पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, पौधे कमजोर हो जाते हैं और फलियों का विकास रुक सकता है। सफेद मक्खी का खतरा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह कई वायरसजनित रोगों को फैलाती है, जिससे खेत का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है। विशेषज्ञ किसानों को सलाह देते हैं कि वे सप्ताह में दो से तीन बार फसल का निरीक्षण करें। खासकर पत्तियों के निचले हिस्से, नई कोपलों और फूलों के आसपास कीटों की मौजूदगी पर ध्यान दें। पत्तियों पर चिपचिपा पदार्थ, कालापन या असामान्य पीलापन संक्रमण के शुरूआती संकेत हो सकते हैं।

खरीफ सीजन में मूंग और कपास की फसलें कीट प्रकोप से प्रभावित हो रही हैं, इसलिए बचाव के लिए सतर्कता बेहद जरूरी है। मूंग में सफेद मक्खी की पहचान समय रहते करना किसानों के लिए महत्वपूर्ण है। यदि कीटों की संख्या आर्थिक नुकसान स्तर तक पहुँचती है तो कृषि विशेषज्ञों की सलाह अनुसार अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है।

इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एससी जैसे रसायन कई क्षेत्रों में प्रभावी पाए गए हैं, लेकिन इनका उपयोग हमेशा फसल की स्थिति, स्थानीय कृषि विभाग की सलाह और उत्पाद लेबल के निदेर्शों के अनुसार ही करना चाहिए। छिड़काव के लिए सुबह या शाम का समय उपयुक्त माना जाता है, जबकि तेज धूप या बारिश की संभावना में दवा का प्रयोग करने से बचना चाहिए। किसानों को दस्ताने और मास्क जैसे सुरक्षा उपकरणों का प्रयोग भी करना चाहिए।

कपास की फसल में हरा तेला यानी जैसिड इस समय चिंता का कारण बन रहा है। यह कीट पत्तियों से रस चूसकर किनारों को पीला कर देता है, जो बाद में भूरे होकर सूख सकते हैं। लगातार प्रकोप रहने पर पौधों की बढ़वार रुक जाती है और उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। नियंत्रण के लिए एसीफेट 75 एसपी जैसे रसायनों का प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन किसी भी दवा के उपयोग से पहले स्थानीय कृषि विभाग की सलाह लेना आवश्यक है।

विशेषज्ञों का कहना है कि एक ही कीटनाशक का बार-बार प्रयोग नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि इससे कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। इसलिए केवल रसायनों पर निर्भर रहने के बजाय समेकित कीट प्रबंधन (आईपीएम) अपनाना अधिक टिकाऊ तरीका है। आईपीएम में खेत की निगरानी, जैविक उपाय, प्राकृतिक शत्रु कीटों का संरक्षण और आवश्यकता अनुसार रासायनिक नियंत्रण शामिल होता है। इससे उत्पादन लागत घटती है और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव भी कम होता है।

समेकित प्रबंधन से घटेगा कीटों का खतरा

किसानों को खेत में पीले चिपचिपे ट्रैप लगाकर सफेद मक्खी जैसे उड़ने वाले कीटों की संख्या का अनुमान लगाना चाहिए। साथ ही खेत में मौजूद खरपतवारों की सफाई करना जरूरी है, क्योंकि कई कीट इन्हीं पर पनपते हैं और बाद में फसल पर हमला करते हैं। संतुलित उर्वरक उपयोग भी कीट प्रबंधन का अहम हिस्सा है।

जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन वाले उर्वरक पौधों को कोमल बना देते हैं, जिससे कीटों का प्रकोप बढ़ सकता है। संतुलित पोषण से पौधे मजबूत रहते हैं और संक्रमण का असर कम होता है। किसान जैविक विकल्पों जैसे जैव-कीटनाशक, लाभकारी सूक्ष्मजीवों और प्राकृतिक शत्रु कीटों का संरक्षण अपनाएं। साथ ही अलग-अलग सक्रिय तत्व वाली दवाओं का क्रम बदलकर प्रयोग करने से कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने की संभावना घटती है।

इन बातों का रखें ध्यान

खेत का निरीक्षण करें और कीटों की संख्या का रिकॉर्ड रखें।
कीट दिखाई देने पर तुरंत पहचान करें, बिना जरूरत के दवा का छिड़काव न करें।
एक ही रसायन का बार-बार उपयोग करने से बचें।
मौसम पूर्वानुमान देखकर ही छिड़काव करें।
जैविक और रासायनिक उपायों का संतुलित उपयोग करें।

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