Sant and Shishya: समुद्र के किनारे पर एक गुरु और उनका शिष्य ….

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Sant and Shishya: समुद्र के किनारे पर एक गुरु और उनका शिष्य बैठे थे। लहरों की मधुर ध्वनि वातावरण को गंभीर और पवित्र बना रही थी। तभी शिष्य ने अपने गुरु से भावुक होकर कहा, ‘गुरुदेव, जब मैं आपके ज्ञान के बारे में सोचता हूं, तो आश्चर्य में पड़ जाता हूं। मैंने आपसे बड़ा कोई और ज्ञानी नहीं देखा। आप तो ज्ञान के अथाह सागर हैं।’ शिष्य की यह बात सुनकर गुरु मुस्कुराए नहीं, बल्कि उनके चेहरे पर हल्की गंभीरता आ गई। उन्होंने धीरे से पास पड़ी एक सूखी लकड़ी उठाई और उसे समुद्र के जल में डुबोकर बाहर निकाला। फिर शिष्य की ओर देखते हुए बोले, ‘वत्स, इस विशाल सागर को देखो। इसमें अनंत जल भरा है, पर यह लकड़ी इसमें डूबकर भी केवल कुछ बूंदें ही अपने साथ ला सकी।’ शिष्य ध्यानपूर्वक गुरु की बात सुन रहा था। Sant and Shishya

गुरु ने आगे कहा, ‘ज्ञान भी इस सागर की तरह अनंत है। मैं भी इस सागर से अभी तक केवल कुछ बूंदें ही प्राप्त कर पाया हूं। इस संसार में मुझसे अधिक ज्ञानी अनेक लोग हैं, जिनसे मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है।’ गुरु के इन शब्दों ने शिष्य के मन को झकझोर दिया। उसे समझ आ गया कि सच्चा ज्ञान वही है, जिसमें विनम्रता हो, न कि अहंकार। इससे संदेश स्पष्ट है कि अहंकार मनुष्य को अंधकार की ओर ले जाता है, जबकि विनम्रता उसे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। जो व्यक्ति स्वयं को पूर्ण समझ लेता है, वह सीखने के मार्ग को बंद कर देता है। इसलिए जीवन में सदा विनम्र रहकर ज्ञान अर्जित करते रहना ही सच्ची सफलता का मार्ग है।

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