कविता: मैं किसान हूँ…

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हा मैं किसान हूँ
जमीं को चीर कर अन्न उगाने वाला।
खुद की पेट काट कर भी
सबकी भूख मिटाने वाला।
सरकार की बीमार
मानसिकता का
शिकार हो कर भी पेट भरने वाला
आय दोगुनी का लॉलीपॉप दे कर ।
एक्ट ला हमें खत्म करने वाली
सरकार के खिलाफ है हम
न हम हिंदुस्तान के खिलाफ है
न हम किसी पार्टी के खिलाफ है
आज जब हम अपने हक के लिए।
सड़क पर खड़े है।
तो आये है कुछ लोग ऐसे भी।
जो लोग हमें खालिस्तानी कहते है।
कोई हमें देश के दुश्मन बता देता है
तो कोई हमें पाकिस्तानी कहता है
खत्म कर देते है ये लोग हमारी उम्मीदों को।
भले ही तुम हमें कुछ भी कहो लेकिन
हां मैं किसान हूँ।
– नृपेन्द्र अभिषेक नृप छपरा

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