विदेशी साजिशों के अलावा अपनी कारगुजारी भी देखें इमरान

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इमरान खान का खिलाड़ी-करियर विजेता के रूप में खत्म हुआ था, पर लग रहा है कि अब राजनीति का करियर पराजय के साथ खत्म हो रहा है। नये पाकिस्तान का सितारा जमीं पर लुढ़क गया है। इमरान का दावा है कि उन्हें हटाने के पीछे अमेरिका की साजिश है। यूक्रेन पर हमले के ठीक पहले उनकी मॉस्को-यात्रा से अमेरिका नाराज कर लिया है। पर बात इतनी ही नहीं है। दरअसल, वे देश की समस्याओं का सामना नहीं कर पाए। साथ ही सेना का भरोसा खो बैठे, जिसे पाकिस्तान में सत्ता-प्रतिष्ठान कहा जाता है। जनता को अमेरिका के खिलाफ भड़का कर उन्होंने पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान को बुरी तरह झकझोर दिया है। इमरान अनाप-शनाप बोल रहे हैं।

आज पाकिस्तान बड़े त्रासद सवालों से घिर गया है। यहां एक अहम सवाल है कि क्या वाकई अमेरिका इमरान खान की सरकार गिराने में लगा हुआ है? इस मामले में पाकिस्तान अपने सबसे करीबी मित्र चीन पर शायद ही उंगली उठाए। जहां तक भारत का सवाल है, तब पाकिस्तान में सरकार गिराने या बनाने में भारत की कभी भूमिका नहीं रही है। कुल मिलाकर, विशेषज्ञ भी यही मान रहे हैं कि इमरान अपनी कमियों का ठीकरा विदेशी ताकतों पर फोड़ रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि पाकिस्तान जिस भी देश को दोषी ठहराएगा, उस देश से उसके संबंध और बिगड़ेंगे। पाकिस्तान अराजकता का शिकार है। माली हालत खराब है। महंगाई आसमान पर है।

पुराने कर्जे चुकाने के लिए नए लिए जा रहे हैं। एफएटीएफ की तलवार सिर पर लटकी हुई है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर अमेरिका नाराज है। इमरान खान ने जोश में आकर पिछले तीन साल में अपने प्रतिस्पर्धियों को कानूनी दांव-पेच में फंसा जरूर लिया, पर अब वे खुद इसमें फंस गए हैं। भारत के साथ रिश्ते भी पाकिस्तान की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हाल ही में भारत की एक मिसाइल दुर्घटनावश पाकिस्तान में गिरने के बावजूद तनाव नहीं बढ़ा। इससे लगता है कि सैन्य-स्तर पर बैकरूम संपर्क बेहतर काम कर रहा है। जहां तक भारत के साथ रिश्तों की बात है, संभावना है कि नाराजगी कम होंगी, क्योंकि नवाज शरीफ के कार्यकाल में दोनों देशों के बीच बातचीत का माहौल बन रहा था।

पाकिस्तान में जो अविश्वास का माहौल बन गया है, उसे अचानक से दूर नहीं किया जा सकता। सत्ता का लालच अपनी जगह है, लेकिन लोकतंत्र में सत्ता पकड़े रखने के लिए बहुमत उससे भी कहीं ज्यादा जरूरी है। हालांकि, यह अच्छी बात है कि पाकिस्तानी फौज पर्दे के पीछे है, वरना ऐसे सियासी मौकों पर उसे खुलकर सत्ता कब्जाने की साजिश में अक्सर देखा गया है। यह लोकतंत्र पसंद पाकिस्तानी नेताओं के लिए बेहतर अवसर है कि वह पूरी जिम्मेदारी का परिचय दें और बहुमत द्वारा शासन की आदर्श स्थिति बनाएं। पाकिस्तान में सच्चा लोकतंत्र न सिर्फ दक्षिण एशिया, बल्कि दुनिया भर के लिए हितकारी है।

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