गुरुग्राम: रिठौज में टूटी 45 साल पुरानी परम्परा

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  • इस बार होगा पंचायत चुनाव, हर बार सर्वसम्मति से चुनी जाती थी पंचायत

  • आजादी के बाद सिर्फ वर्ष 1977 में हुआ था चुनाव

संजय कुमार मेहरा
गुरुग्राम। सोहना खंड के गुर्जर बिरादरी के खटानपुरी गोत्र के सबसे बड़े गांव रिठौज में आजादी के बाद सिर्फ एक बार (वर्ष 1977 में) पंचायत चुनाव (Panchayat Election haryana) भले ही हुआ हो, लेकिन इसके बाद कभी भी चुनाव नहीं हुआ। ग्रामीणों द्वारा आपसी पे्रमभाव से बैठकर छोटी सरकार को चुन लिया जाता था। इस बार 45 साल पुरानी यह परम्परा धराशायी हो गई और उम्मीदवारों ने चुनाव के लिए ताल ठोंक दी। अब 17 उम्मीदवार सरपंच पद के लिए चुनाव मैदान में हैं। आगामी 12 नवंबर को मतदान होगा।

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हरियाणा के साथ-साथ दूसरे राज्यों के लिए रिठोज गांव की पंचायत मिसाल थी। इस गांव में वर्ष 1952 से सर्वसम्मति से ही सरपंच चुने जाते रहे हैं। इस गांव में तीन दादा का परिवार है। उनमें से बारी-बारी से सरपंच और पंच चुन लिए जाते हैं। कभी भी यहां पर ना तो मतदान के लिए ढोल रखे गए और ना ही कभी ईवीएम की जरूरत पड़ी। बुजुर्गों ने गांव की इस परम्परा को सदा जिवित रखा।

गांव के भाईचारे को मजबूत बनाने के लिए हर बार के पंचायत चुनावों में बुजुर्गों द्वारा कभी चुनाव में जाने की नौबत नहीं आने दी गई। हालांकि वर्ष 1977 में यह परम्परा कुछ लोगों की जिद के आगे टिकी नहीं रह सकी। आखिरकार चुनाव के जरिये ही पंचायत चुनी गई। इसके बाद के चुनावों में फिर से बुजुर्गों की ही चली और उन्होंने तब से लेकर अब तक गांव को चुनावों का मुंह नहीं देखना पड़ा था। सर्वसम्मति से पंचायत चुनीं जाती रही।

युवाओं की जिद के आगे हारे बुजुर्ग |

रिठौज गांव में इस बार यानी 2022 के पंचायत चुनाव में भी सर्वसम्मति बनाने के खूब प्रयास किए गए। युवाओं को मनाने का प्रयास किया गया। गांव में कई मुद्दे ऐसे हावी हो गए कि पंचायत गठित करने के लिए सर्वसम्मति के रास्ते निकल ही नहीं पाए। आखिर बुजुर्गों ने भी हार मान ली और पंचायत चुनाव लड़ने का बिगुल बज गया। गांव के 17 लोगों ने सरपंच पद के लिए नामांकन किया है। आगामी 12 नवम्बर को ईवीएम के माध्यम से इनकी किस्मत का फैसला होगा।

आदर्श माने जाते हैं दादा भूमिया

रिठोज गांव में तीन दादाओं की संतान रहती हैं। सबसे बड़े दादा गुर्जर, दादा भूरा ओर दादा सैंया थे। दादा गुर्जर के परिवार से सदस्य को निर्विरोध सरपंच चुना गया। उसके बाद दूसरे दादा के परिवार से और अगली बार और तीसरे सबसे छोटे दादा के परिवार से निर्विरोध सरपंच चुने जाते थे। तीनों दादा के वंशज बारी-बारी अपने-अपने परिवार से सरपंच चुनते थे। पूरा गांव यह निर्णय दादा भूमिया को साक्षी मानकर लेता था।

वर्ष 1977 में गांव में आपसी मनमुटाव हो गया और सहमति नहीं बनने से चुनाव कराना पड़ा। गांव के गणमान्य लोगों में पूर्व चेयरमैन शेलेश खटाना, प्रताप खटाना, हेमराम खटाना, पूर्व सरपंच प्रदीप खटाना, पूर्व सरपंच राजवीर रोहतास खटाना, रामसिंह, महाराज सिंह, सरपंच धर्मपाल आदि ने सरपंच चुनने के लिए सर्वसम्मति बनाने के काफी प्रयत्न किए, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया।

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