कहानी संघर्ष की: कभी दूध बेचा तो कभी की मजदूरी, और बन गई मिसाल

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सच कहूँ/राजू ओढां। कहावत है कि अगर मन में आत्मविश्वास व हौंसले बुलंद हो तो विकट परिस्थितियां भी घुटने टेकने को विवश हो जाती है। इसका एक उदाहरण सरसा जिला से गांव नुहियांवाली में देखा जा सकता है। जहां 43 वर्षीय एक महिला ने विकट परिस्थितियों में भी हार न मानते हुए इसे चुनौती के रूप में लेकर एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिस पर पूरे गांव को गर्व महसूस हो रहा है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जब सच-कहूँ संवाददाता राजू ओढां ने महिला राजबाला से बात की तो उसने भावुक होते हुए पूरी दास्तां ब्यान कर दी।

मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मीं राजबाला की शादी गांव नुहियांवाली में मदन लाल से हुई थी। मदन लाल पेशे से फर्नीचर का एक अच्छा कारीगर था। उसके 2 बेटे हैं। कोई जमीन-जायदाद न होने के कारण घर का पूरा खर्च मदन लाल के कंधों पर ही था। करीब 15 वर्ष पूर्व मदन लाल का रोड एक्सीटेंड हो गया। जिसके बाद उसका स्वास्थ्य इस कदर बिगड़ा कि काफी उपचार के उपरान्त भी उसकी तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ और वह हाथों-पैरों से दिव्यांग हो गया। जिसके बाद मदन लाल के परिवार की आर्थिक स्थिति बुरी तरह से प्रभावित होकर रह गई। ऐसे में घर व पति को संभालना राजबाला के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था।

विकट परिस्थितियां भी नहीं डुला पाई हौंसला

पति की अपंगता व घर का खर्च उठाना राजबाला के लिए बड़ी चुनौती बन गया। लेकिन राजबाला ने इन परिस्थितियों में भी हौंसला न खोते हुए अपने परिवार को संभाला। राजबाला ने अपने दोनों बेटों में अच्छे संस्कार भरते हुए उन्हें पढ़ाया-लिखाया ही नहीं अपितु उनके दिमाग में ये बात भरी कि बेटा परिस्थितियां चाहें कैसी भी हों हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए। वे दोनों अच्छा पढ़ें। उन्हें सफल बनाने के लिए वह मेहनत-मजदूरी कर लेगी। मां की प्रेरणा ने दोनों बेटों में जोश भर दिया और उन्होंने अपनी मां के साथ मेहनत-मजदूरी करते हुए अपनी पढ़ाई भी निरंतर जारी रखी।

कड़ी मेहनत मजदूरी कर जोड़ी बाई-बाई

अपनी घर की दास्तां सुनाते हुए राजबाला पुरानी यादों में डूबते हुए भावुक हो गई। उसने बताया कि पति की दिव्यांगता के बाद उसने लोगों के खेतों में मजदूरी करने के साथ-साथ पशुओं का दूध बेचकर पाई-पाई जोड़ी और बेटों की पढ़ाई-लिखाई व अन्य खर्च चलाया। राजबाला के दोनों बेटों प्रवीण व सोनू की इच्छा थी कि वे आर्मी में जाएं। इसके लिए उन्होंने खूब मेहनत की। अपने बेटों की इस इच्छा को पूरा करने में राजबाला ने जान लगा दी।

पत्र आते ही झलक पड़े आंखों से आंसू’

राजबाला ने संवाददाता को बताया कि विकट परिस्थितियां तो आर्इं लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी। मुझे उम्मीद थी कि ये बनवास एक दिन जरूर खत्म होगा। भगवान ने मेरी सुन ली और मेरे दोनों बेटों का फौज में एक ही दिन सिलेक्शन हो गया। इंडियन आर्मी की तरफ से जैसे ही दोनों बेटों के सिलेक्शन का पत्र आया तो राजबाला की आंखें झलक उठीं। जब ये सूचना गांव में फैली तो हर कोई राजबाला की मेहनत व हौंसले की प्रशंसा करता नजर आया। राजबाला के दोनों बेटे इस समय आर्मी में हैं। उसने बताया कि सुख-दुख, तकलीफें व बूरा वक्त इन्सान की परीक्षा लेने आता है। ऐसे में हमें हौंसला नहीं खोना चाहिए। अगर एक रास्ता बंद होता है तो दूसरा रास्ता भी खुल जाता है। राजबाला आज उन महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत बन रही जो विकट परिस्थितियों में हौंसला खो देती हैं।

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