Sugarcane Farming: गन्ने के साथ सब्जियां और मसाला फसलें उगाएं

सितंबर में गन्ने की खेती करने वाले किसान रखें इन बातों का ध्यान

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Sugarcane Farming: हिसार (डाँ. संदीप सिंहमार)। शरद ऋतु में गन्ने की खेती शुरू करने वाले किसानों के लिए सितंबर का दूसरा पखवाड़ा खेत की योजना बनाने का महत्वपूर्ण समय है। इस दौरान गन्ने की मुख्य फसल के साथ कुछ कम अवधि वाली फसलों को अंतरफसल के रूप में लगाया जा सकता है। इससे खेत की खाली जगह का बेहतर उपयोग होता है और गन्ने की शुरूआती अवस्था में अतिरिक्त आय का अवसर मिल सकता है। गन्ने की कतारों के बीच लगभग 90 से 120 सेंटीमीटर का अंतर रखते हुए फूलगोभी, पत्तागोभी, गांठ गोभी, धनिया, मेथी और लहसुन जैसी फसलों को लिया जा सकता है। हालांकि अंतरफसल का चयन स्थानीय मौसम, मिट्टी, पानी की उपलब्धता और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

सावधानी: गन्ने के साथ ऐसी फसलें लगाना बेहतर रहता है जिनकी अवधि कम हो और जिनकी बढ़वार बहुत अधिक फैलने वाली न हो। इससे दोनों फसलों के बीच पोषक तत्व, पानी और जगह को लेकर अनावश्यक प्रतिस्पर्धा कम की जा सकती है। दोनों फसलों की खाद एवं उर्वरक जरूरत अलग हो सकती है। इसलिए केवल एक फसल को ध्यान में रखकर उर्वरक डालने के बजाय मिट्टी की स्थिति और दोनों फसलों की आवश्यकता के अनुसार पोषण प्रबंधन करें। खरपतवार नियंत्रण के लिए भी विशेष सावधानी जरूरी है। किसी रसायन का इस्तेमाल करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि वह गन्ने के साथ लगाई गई अंतरफसल के लिए सुरक्षित है। दवा की मात्रा और उपयोग का समय हमेशा संबंधित कृषि विशेषज्ञ या कृषि विभाग की अनुशंसा के अनुसार रखें।

नमी का रखें ध्यान: शरदकालीन गन्ने में शुरूआती अंकुरण अच्छा होने के लिए खेत में उचित नमी होना जरूरी है। अंतरफसल की बिजाई के बाद खेत की नमी और मौसम की स्थिति देखकर गन्ने को हल्की सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है। जरूरत से ज्यादा पानी देने से बचें, विशेषकर ऐसे खेतों में जहां जलभराव की समस्या रहती हो।

गन्ने में लाल सड़न रोग की समस्या दिखाई देने पर समय गंवाए बिना प्रभावित पौधों को खेत से निकालना चाहिए। सीओ 0238 किस्म में इस रोग के प्रति संवेदनशीलता अधिक बताई जाती है, इसलिए इस किस्म की फसल में नियमित निरीक्षण विशेष रूप से जरूरी है।

रोगग्रस्त पौधों को निकालने के बाद उन्हें खेत में ही पड़ा न रहने दें। उन्हें सुरक्ष्स्रिात तरीके से खेत से बाहर करें। साथ ही ऐसे खेत का पानी दूसरे खेतों में जाने से रोकना जरूरी है, क्योंकि संक्रमित पानी रोग के फैलाव का कारण बन सकता है। अगली फसल के लिए स्वस्थ बीज सामग्री का चुनाव करें और रोग प्रभावित खेतों में कृषि विशेषज्ञ की सलाह से फसल चक्र अपनाएं।

निगरानी जरूरी: गन्ने में सोका रोग की समस्या को नियंत्रित करने के लिए लंबे अंतराल वाला फसल चक्र अपनाने और स्वस्थ बीज का इस्तेमाल करने पर जोर दिया जाता है। लगातार एक ही खेत में गन्ना उगाने के बजाय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार फसल चक्र अपनाना लाभकारी हो सकता है। तराई बेधक, जड़ बेधक और चोटी बेधक जैसे कीटों के प्रबंधन में जैविक उपायों को भी शामिल किया जा सकता है। ट्राइकोग्रामा आधारित कार्ड का उपयोग करते समय स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग द्वारा बताई गई मात्रा, समय और विधि का पालन करें।

बारिश के बाद खेत में करें जरूरी काम: सितंबर में बारिश होने के बाद सबसे पहले खेत की स्थिति देखें। यदि कहीं पानी रुका हुआ है तो उसकी निकासी की व्यवस्था करें। जलभराव से जड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और कई रोगों का खतरा बढ़ सकता है। गन्ने को खरपतवारों से मुक्त रखना भी जरूरी है। पछेती फसल में पौधों को गिरने से बचाने के लिए मिट्टी चढ़ाने और बंधाई जैसे कार्य समय पर पूरे करें। 

ये लक्षण दिखें तो लें सलाह

पोक्का बोइंग रोग में गन्ने की नई पत्तियों का रंग हल्का पड़ सकता है और पत्तियों पर धारियां दिखाई दे सकती हैं। रोग बढ़ने पर पत्तियां सिकुड़ने या मुड़ने लग सकती हैं। ऐसे लक्षण नजर आने पर पहले रोग की सही पहचान कराना जरूरी है। पुष्टि होने के बाद कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार अनुशंसित फफूंदनाशी का प्रयोग करें। केवल अनुमान के आधार पर दवा का छिड़काव करने से बचें।

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