Natarang Ubha: मराठी रंगमंच की समृद्ध विरासत और बदलते स्वरूप को मंच पर उतारता ‘नटरंग उभा’

मराठी रंगमंच की समृद्ध विरासत और बदलते स्वरूप को मंच पर उतारता ‘नटरंग उभा’

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मुंबई (सच कहूँ न्यूज़)। Natarang Ubha: सेंट झेवियर्स कॉलेज के मराठी वाङ्मय मंडल की ओर से ‘नटरंग उभा’ विषय पर आयोजित विशेष कार्यक्रम में मराठी रंगमंच की समृद्ध परंपरा, विकास यात्रा और बदलते स्वरूप को कला की विभिन्न विधाओं के माध्यम से जीवंत किया गया। कॉलेज कैंपस में 26 सितम्बर को आयोजित किये गये फेस्ट के दौरान नाटक, संगीत, नृत्य, साहित्य और ललित कलाओं के अनूठे संगम ने दर्शकों को मराठी रंगमंच की सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराया। 

फेस्ट प्रतिनिधि ने *‘सच कहूँ’ संवाददाता को बताया कि* ‘नटरंग उभा’ का उद्देश्य मराठी रंगमंच की विविध परंपराओं को नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करना और विद्यार्थियों को प्रदर्शन कलाओं से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ रंगमंच की प्रस्तुति और विचारों के तरीके जरूर बदले हैं, लेकिन कलाकार और दर्शकों के बीच का संबंध आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

कार्यक्रम को पांच प्रमुख हिस्सों में प्रस्तुत किया गया। इसकी शुरुआत *‘समकालीन रंगमंच’* से हुई, जिसे नाट्य विभाग ने नाटक के माध्यम से प्रस्तुत किया। इसके बाद *‘दशावतार’* के जरिए पारंपरिक रंगमंचीय कला, वेशभूषा और रंगमंचीय श्रृंगार को प्रदर्शित किया गया। 

कार्यक्रम के अगले चरण में संगीत विभाग ने *‘संगीत नाटक’* प्रस्तुत किया और पद्मश्री से सम्मानित हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका एवं रंगमंच कलाकार *जयमाला शिलेदार* को श्रद्धांजलि दी। उनके पांच दशकों से अधिक लंबे रंगमंचीय सफर और 4,500 से अधिक प्रस्तुतियों के योगदान को ‘संगीत मानपमान’, ‘संगीत सौभद्र’ के चुनिंदा गीतों व दृश्यों तथा ‘देवमाणूस’ की झलक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। 

वहीं *‘सामाजिक-राजनीतिक रंगमंच’* के माध्यम से कला और समाज के बीच के संबंध को सामने रखा गया। प्रस्तुति में एक ऐसे लेखक की यात्रा को केंद्र में रखा गया, जिसे अपने विचारों के कारण विरोध का सामना करना पड़ता है। इसके जरिए बताया गया कि कलाकार सामाजिक परिस्थितियों और विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए रूपक एवं रंगमंचीय प्रस्तुति का सहारा कैसे लेते हैं। 

शाम का समापन नृत्य विभाग की *‘तमाशा’* प्रस्तुति से हुआ। इसमें महाराष्ट्र की लोक-रंगमंच परंपरा और ‘तमाशा की साम्राज्ञी’ विठाबाई नारायणगांवकर की विरासत को मंच पर प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम के दौरान मराठी सांस्कृतिक एवं प्रदर्शन कला से जुड़े कलाकारों *देवेंद्र पेम, मेघा घाडगे और मयूर सुकाले* के साथ परिचर्चा भी आयोजित की गई, जिसमें मराठी रंगमंच के बदलते स्वरूप और उसकी निरंतर प्रासंगिकता पर चर्चा हुई। 

विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए देवेंद्र पेम ने कहा कि कॉलेज का समय गलतियां करने और उनसे सीखकर आगे बढ़ने का अवसर देता है तथा विद्यार्थियों का रंगमंच से जुड़ाव बेहद जरूरी है। 

उल्लेखनीय है कि *राष्ट्रीय समाचार पत्र ‘सच कहूँ’ तथा ‘सच्ची शिक्षा’ मैगजीन इस फेस्ट के मीडिया पार्टनर हैं।* दोनों मीडिया संस्थानों की ओर से फेस्ट की गतिविधियों, प्रस्तुतियों और सांस्कृतिक पहल को पाठकों तक पहुंचाने में सहयोग किया जा रहा है।

104वें वर्ष में प्रवेश कर रहे मराठी वाङ्मय मंडल के इस आयोजन ने मराठी रंगमंच की परंपरा को केवल अतीत की स्मृतियों के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसकी वर्तमान प्रासंगिकता और भविष्य की संभावनाओं को भी रेखांकित किया।

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