Delhi Shabdotsav: ऐतिहासिक धरोहरों का नाम बदलने को लेकर पूर्व एएसआई प्रमुख का आया बड़ा बयान

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ASI Dharmveer Sharma Statement: नई दिल्ली। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पूर्व महानिदेशक धर्मवीर शर्मा ने नामकरण को लेकर चल रही राजनीतिक बहस पर अपनी स्पष्ट राय रखी है। उन्होंने कहा कि किसी स्थान या धरोहर का नाम बदलना केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं होता, बल्कि इसके माध्यम से इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति को धीरे-धीरे समाप्त करने का प्रयास किया जाता है। उनके अनुसार, भारत और सनातन परंपरा के इतिहास को कमजोर करने के लिए ऐसे प्रयास अतीत में भी किए गए हैं। Delhi Shabdotsav News

शनिवार को आयोजित ‘दिल्ली शब्दोत्सव 2026’ कार्यक्रम में बोलते हुए धर्मवीर शर्मा ने भारतीय संस्कृति, भाषा और ऐतिहासिक धरोहरों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि आज नाम परिवर्तन का विरोध करने वाले यह तर्क देते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, जबकि वास्तविकता यह है कि नाम बदलने से उस स्थान का मूल इतिहास धुंधला पड़ जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि विजयपुर सीकरी, जो सिकरवार वंश द्वारा बसाया गया नगर था, आज फतेहपुर सीकरी के नाम से जाना जाता है और इससे उसके मूल इतिहास को भुला दिया गया।

यह केवल एक मीनार नहीं, बल्कि एक प्राचीन खगोलीय वेधशाला थी

कुतुब मीनार के संदर्भ में पूर्व एएसआई प्रमुख ने दावा किया कि यह केवल एक मीनार नहीं, बल्कि एक प्राचीन खगोलीय वेधशाला थी। उन्होंने बताया कि वर्षों के अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि यह संरचना लगभग 25 इंच दक्षिण दिशा की ओर झुकी हुई है, जो सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायण की गणना से जुड़ी हुई है। उनके अनुसार, 21 जून के आसपास जब सूर्य दक्षिणायन में प्रवेश करता है, उस समय दोपहर में कुतुब मीनार की छाया नहीं बनती, जो इसके वैज्ञानिक उपयोग की ओर संकेत करता है। Delhi Shabdotsav News

धर्मवीर शर्मा ने यह भी कहा कि कुतुब मीनार के चारों ओर 27 नक्षत्रों से जुड़े मंदिर स्थित थे। उनके अनुसार, मीनार में बनी 27 खिड़कियां इन्हीं नक्षत्रों का प्रतीक हैं। उन्होंने दावा किया कि कुतुबुद्दीन ऐबक के एक अभिलेख में 27 मंदिरों के ध्वंस का उल्लेख मिलता है, जिनके अवशेषों से जामा मस्जिद का निर्माण किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि मीनार के केंद्र में स्थित ‘विष्णु ध्वज’ इसे सूर्य अध्ययन से जुड़े स्थापत्य का प्रमाण बनाता है।

संस्कृति और भाषा पर बोलते हुए पूर्व एएसआई निदेशक ने कहा कि सनातन परंपरा का प्रभाव विश्वभर में दिखाई देता है। उन्होंने यह दावा किया कि दुनिया की अनेक भाषाओं में संस्कृत के शब्द समाहित हैं और संस्कृत को वैश्विक भाषाओं की मूल स्रोत माना जा सकता है। साथ ही उन्होंने वर्तमान समय में संस्कृत भाषा के प्रति घटती रुचि पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया। Delhi Shabdotsav News

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