बापू-रामचरितमानस
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गांधीजी का स्पष्ट मत था कि किसी भी मामले में गुण देखे जाने चाहिए, दोष नहीं। संसार में ऐसी कोई चीज नहीं, जिसमें अवगुण न निकाला जा सके। गांधीजी रामचरित मानस के बड़े प्रशंसक थे। वे तुलसीदास रचित इस कृति को संसार का अनुपम ग्रंथ मानते थे। लेकिन बापू के ऐसे मित्रों की कमी नहीं थी, जिन्हें इसमें कई दोष दिखाई देते थे। इन मित्रों का मत था कि तुलसीदास रचित इस काव्य में स्त्री जाति की निंदा है। विभीषण के देशद्रोह की प्रशंसा है। धोखे से किया गया बालि वध है। निम्न जाति के लोगों के साथ अन्याय है। ऐसी कई बातें हैं, जिनके आधार पर मानस को बड़ा ग्रंथ नहीं माना जा सकता।
गांधीजी ने कई बार अपने इन मित्रों को समझाने की कोशिश की कि इन बातों का तटस्थ होकर विश्लेषण करना चाहिए, न कि सतही ढंग से बात की जानी चाहिए। मानस एक अद्वितीय ग्रंथ है।
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