कृष्ण की मित्रता

Published On
कृष्ण और सुदामा की मित्रता नि:स्वार्थ प्रेम का प्रतीक है। सच्ची मित्रता (Friendship ) में गरीबी और अमीरी बाधक नहीं होनी चाहिए। जो अपने मित्र से कपट करता हैं वह दरिद्र हो जाता है। कृष्ण और सुदामा बचपन के मित्र (Friendship ) थे लेकिन युवावस्था में कृष्ण द्वारकाधीश के मित्र होते हुए भी वह दरिद्रता में जीवन निर्वाह करते रहे। जब भिक्षा में अन्न न मिलता तो भूखे पेट रहते, फटे-कपड़े पहनते। एक दिन जब उनकी पत्नी सुशीलता को पता चला कि द्वारकाधीश श्रीकृष्ण सुदामा के परम-मित्र (Friendship) हैं तो उन्होंने सुदामा को आग्रह कर कृ ष्ण से मिलने के लिए द्वारका भेजा। तब भी सुदामा मन में यह इच्छा लेकर नहीं गए कि द्वारकाधीश उनकी दरिद्रता दूर क रेंगे। लेकिन सुदामा नाम के गरीब ब्राहमण के आने की सूचना मिलते ही द्वारक ाधीश अपने सिंहासन से खडे होकर नंगे पांव उनकी अगवानी के लिए दौड़ पड़े और सुदामा को अपने गले से लगा लिया। महल में ले जाकर उन्हें सिंहासन पर बिठाया और अपने नेत्रों के आँसुओं से दु:खी मित्र के चरण धोए और सुदामा की दरिद्रता एक क्षण में दूर कर दी। संत क हते है कि दोस्ती के बीच में स्वार्थ नहीं होना चाहिए। वर्तमान में हर इंसान स्वार्थ के वश होकर दोस्ती करता है। लेकि न स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर दोस्त को भूल जाता है। इतना ही नहीं दोस्तों की दगाबाजी की घटनाएँ हमारी संस्कृति के लिए शर्मनाक हैं।

बुद्ध का उत्तर

साधना के मार्ग को सभी धर्मों में दुष्कर माना गया है। एक अच्छा साधक ऐसे गुणों से युक्त होता है, जो आत्मज्ञान के प्रकाश से दूसरों को भी अलोकित करता है। एक बार महात्मा बुद्ध से उनके एक शिष्य ने प्रश्न किया- भगवान, श्रेष्ठ साधक के क्या लक्ष्य होते हैं? तथागत ने प्रश्न का इस प्रकार उत्तर दिया-‘चूहे चार प्रकार के होते है।’ एक वे, जो अपनी बिल खुद बनाते है, लेकिन उसमें रहते नहीं। दूसरे वो जो बिल में रहते नहीं, पर स्वयं नहीं खोदते। तीसरे वो जो बिल बनाते हैं, और उसमें स्वयं रहते हैं। चौथे वे जो न तो बिल बनाते हैं और न ही उसमें रहते हैं। इसी प्रकार साधक भी चार भागों में बाँटे जा सकते है। एक वे जो शास्त्र पढ़ते है, पर उसे जीवन में नहीं उतारते। दूसरे वे जो शास्त्रज्ञानी न होकर भी जीवन में सिद्धांत का साक्षातकार करते हैं। तीसरे वे जो शास्त्रज्ञान भी प्राप्त करते है और सत्य का अनुभव भी। चौथे वे, जो न तो शास्त्र का अभ्यास करते हैं, और न ही सत्य का आचारण ही। अब तुम ही निर्णय करों कि श्रेष्ठ साधक कौन है?’

 

अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।

About The Author

Related Posts