साख का सवाल

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प्रसिद्ध रसायनज्ञ प्रफुल्ल चंद्र राय ने सन् 1892 में दवा की नामी कंपनी ‘बंगाल केमिकल्स’ की शुरुआत आठ सौ रुपये की मामूली पूंजी से की थी। राय देशभक्त थे और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े थे। वे अपने काम के प्रति समर्पित रहते थे। बंगाल केमिकल्स को लेकर अनेक लोगों की मान्यता थी कि यह विदेशी दवा कंपनियों के आगे नहीं टिक पाएगी। लेकिन प्रफुल्ल चन्द राय ने संकल्प लिया था कि इसमें बनी कोई भी दवा विदेशी दवा से हल्की या कमजोर नहीं होगी।
एक दिन जब एक दवा बन रही थी, तो कई सौ बोतलों का रसायन कुछ बिगड़ गया। इस पर कारखाने के एक कमर्चारी ने कहा, ‘थोड़ा सा ही तो बिगड़ा है। किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा। बाजार में यह आसानी से बिक जाएगी। इससे दवा के गुणों पर भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’ इस पर दूसरा कमर्चारी बोला, ‘वैसे भी अब बंगाल केमिकल्स अच्छी और सर्वोत्तम दवाओं की निशानी बन गई है। इसलिए इन्हें खरीदने में भी किसी को शंका नहीं होगी।’कमर्चारियों की बातें सुनकर प्रफुल्ल चंद्र राय बोले, ‘नहीं-नहीं। ऐसी दवाओं से हमारी हानि होगी। हमारी कंपनी को दाग लगेगा। थोड़े से रुपयों का नुकसान हमारी कंपनी के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा देगा। मैं ग्राहकों से विश्वासघात नहीं कर सकता।
किसी भी कंपनी की सफलता ग्राहकों के विश्वास के दम पर होती है। मैं इस साख को नहीं गिरने दूंगा, चाहे मुझे कितना भी बड़ा नुकसान क्यों न उठाना पड़े।’ इसके बाद प्रफुल्ल चंद्र राय ने उस रसायन को फिंकवा दिया और नए सिरे से दवा बनाने में जुट गए। इस तरह कंपनी के कमर्चारियों को एक बड़ी सीख मिली।

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