धर्म की भूमिका

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गौतम बुद्ध कहीं जा रहे थे। रास्ते में विश्राम के लिए एक नदी के किनारे रुके। देखा कि एक भिक्षुक स्नान कर रहा है। फिर उसने छह दिशाओं में प्रणाम किया और जाप करने लगा। जब उसकी पूजा समाप्त हुई तो बुद्ध ने पूछा- महाशय, आपने अभी-अभी छहों दिशाओं को प्रणाम किया। इसका क्या अभिप्राय है? उस भिक्षुक ने संकोच के साथ उत्तर दिया- यह तो मुझे नहीं मालूम। सभी करते हैं इस लिए कर रहा हूं। बुद्ध ने हंसते हुए कहा- जब मूल उद्देश्य जानते ही नहीं, तो पूजा-पाठ और जाप का क्या महत्व है? तब वह भिक्षुक बोला- आप ही बता दीजिए कि छहों दिशाओं को प्रणाम करने का क्या प्रयोजन है?
बुद्ध बोले- माता-पिता और गृहपति ये पूर्व दिशा हैं, आचार्य दक्षिण, स्त्री तथा पुत्र-पुत्रियां पश्चिम और मित्रादि उत्तर दिशा। रही ऊर्ध्व और अधो दिशा, तो ऊर्ध्व दिशा ब्राह्मण हैं तथा सेवक अधो दिशा हैं। इन छहों दिशाओं को किया गया प्रणाम इन सभी व्यक्तियों को प्रणाम करने के समान होता है। भिक्षुक बोला- मगर सेवक को प्रणाम करने का क्या उद्देश्य है? प्रणाम तो उन्हें सबको करना चाहिए। बुद्ध ने कहा- सेवक भी मनुष्य हैं और हम भी मनुष्य हैं। जब वे हमारी सेवा करते हैं, तो हमारा भी कर्तव्य हो जाता है कि हम उनकी सेवा के बदले उनके प्रति स्नेह और वात्सल्य प्रकट करें। सेवकों को प्रणाम करते समय हम उनके प्रति स्नेहभाव व्यक्त कर रहे होते हैं। उन्हें तुच्छ भाव से नहीं देखना चाहिए। हरेक मनुष्य एक-दूसरे के समान है चाहे वह किसी भी तरह का कार्य करता हो। धर्म हमें यही तो सिखाता है। इस उत्तर से भिक्षुक संतुष्ट हो गया।

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