समाज का संकट

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चरक संहिता के आरंभिक रचयिता महर्षि पुनवर्सु ने सभी तरह के रोगों के उपचार के लिए जड़ी-बूटियों तथा अन्य औषधियों की जानकारी से अपने शिष्यों को अवगत करा दिया था। अपने शिष्यों को कार्य में निपुण बनाने के बाद वह अपने एक शिष्य अग्निवेश के साथ वन की ओर चल पड़े। वन में चलते हुए वे प्रकृति को निहारते हुए चल रहे थे ।
तभी महर्षि पुनवर्सु ने चारों दिशाओं में अपनी नजरें घुमाई और अग्निवेश से बोले, ‘वत्स, मुझे भविष्य अच्छा नहीं दिखाई दे रहा है।’ महर्षि की बात सुनकर अग्निवेश उन्हें हैरानी से देखते हुए बोला, ‘गुरु जी, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? भला ऐसे कौन से लक्षण आपको यहां दिखाई दिए?’ महर्षि बोले, ‘वत्स, मुझे ऐसा लग रहा है कि जल, वायु और समाज का वातावरण बिगड़ने वाला है।’ महर्षि की बात सुनकर अग्निवेश ने कहा, ‘गुरुजी, आप महान विद्वान हैं। आपने चरक संहिता में समस्त रोगों की औषधि लिख रखी है फिर आपको विनाश की आशंका क्यों सता रही है?’  महर्षि बोले, ‘वत्स, शरीर के रोगों का इलाज संभव है पर जिस की सोच भ्रष्ट हो जाती है उसका कोई इलाज नहीं कर सकता।
विचार भ्रष्ट होने से ही राजनीति और समाज में विकृति आ जाती है। यहां की वायु में मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि लोगों की सोच भ्रष्ट हो रही है।’ इस पर अग्निवेश ने पूछा, ‘गुरुजी, क्या भ्रष्ट सोच से बचने का कोई उपाय नहीं है?’ महर्षि बोले, ‘ जिस तरह जीर्ण-शीर्ण शरीर को एक वैद्य बचा सकता है उसी तरह विचारक और शिक्षाशास्त्री जीर्ण-शीर्ण मस्तिष्क को बचा सकते हैं। आज समाज को ऐसे ही लोगों की आवश्यकता है।’
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