सिंकदर बादशाह को फकीर ने सुनाई खरी-खरी बातें

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एक दिन बादशाह सिकंदर को एक संत महात्मा (फकीर) के साथ मुलाकात करने का मौका मिला, जो किसी निराली मस्ती के रंग में बेपरवाह, बेफिक्र हो जमीन पर लेटा हुआ था। जब सिकंदर उसके पास गया तो फकीर ने उसे बुलाना तो एक तरफ रहा उसकी तरफ देखा तक नहीं। सिकंदर संत महात्मा के इस व्यवहार के साथ मन ही मन बहुत हैरान हुआ परंतु उसके उस्ताद ने किसी समय यह सुझाव दिया था कि संतों के पास इतनी महान ईश्वरीय शक्ति होती है, जिसके मुकाबले दुनिया की बादशाहत की पूरी ताकत एक तिनके के समान ही होती है।
सिकंदर ने बहुत आदर के साथ उस महात्मा को कहा, ‘‘बाबा! मैं यूनान का बादशाह सिकंदर हूं, इस समय पूरी धरती पर मेरा ही साम्राज्य है। मेरे पास धन माल के बेअंत खजाने हैं, अगर आपको किसी पदार्थ की जरूरत हो तो आप मेरे से मांग सकते हो। सिकंदर आपको वहीं देगा।’’ महात्मा यह बात सुनकर जरा मुस्कुराए व कहने लगे अगर तूं मेरे पर इतना मेहरबान है तो प्रकृति की ओर से जो सूरज की धूप मेरी तरफ आ रही है, उसे न रोक, मुझे ओर किसी चीज की जरूरत नहीं है। सिकंदर बहुत हैरान व शर्मिंदा हुआ कि इस महात्मा ने मेरी बादशाही व मेरी शक्ति की जरा भी कद्र नहीं की परंतु बादशाह बहुत समझदार था।
उसने फिर से फकीर के आगे बेनती की कि हे महात्मा मुझे कुछ ज्ञान बख्शो। संत महात्मा ने उतर दिया :- ‘‘हे सिकंदर! बेशक तूने सारी दुनिया का धन, दौलत व अन्य पदार्थ व धरती को जीत लिया है, परंतु यह कोई जीत नहीं है। तूं आज तक किसी इन्सान के दिल को नहीं जीत सका। जिस ताकत व जिस हथियार से दिलों को जीता जाता है, तूं उससे अभी खाली है। वह केवल ‘प्रेम’ है। जो ताकत तेरे हाथ में है, वह सरासर कहर (जुल्म) है। जो कुछ तूने जीता है तेरे साथ नहीं जाएगा। बिना एक प्रेम के सारी दौलतें नाश्वान व व्यर्थ हैं। मेरे दिल में तो मस्ती के समुन्द्र उमड़ रहे हैं। मुझे संसार के किसी भी पदार्थ की कोई जरूरत नहीं। अब तू जो जी चाहे सो कर।’
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