ज्ञानकोष्ठ: भारतीय अफीम को लेकर युद्ध

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चीन को अक्सर दूसरे देशों की सीमाओं पर कब्जा करने वाला देश समझा जाता है, लेकिन ये चीन एक ऐसा देश भी रहा है जिसने अफीम की वजह से ब्रिटेन के साथ युद्ध लड़ लिया था। 19वीं सदी में हुआ अफीम वॉर को आज भी चीन के जिद्दी रवैये का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। ये युद्ध पूरे तीन साल तक चला था। इस युद्ध में जहां चीन अकेला था तो ब्रिटेन और फ्रांस की सेनाएं साथ थी। अफीम युद्ध दो बार हुआ था। चीन में जिस समय किंग वंश का शासन था उस समय अफीम के लिए युद्ध हुआ।

पहला अफीम वॉर तीन जून 1839 को शुरू हुआ और 1842 को खत्म हुआ। दूसरा अफीम युद्ध सन 1856 में शुरू होकर 1860 में खत्म हुआ। दूसरे अफीम युद्ध को एरो वॉर या एंग्लो-फ्रेंच वॉर के तौर पर भी जानते हैं। फ्रांस और चीन जहां एक तरफ थे तो वहीं चीन की सेनाएं अकेली थीं। हर युद्ध में चीन को मुंह की खानी पड़ी और विदेशी सेनाओं ने अपनी ताकत को साबित किया। साथ ही चीन की सीमाओं पर भी कब्जा करने में सफल रहीं। 20वीं सदी में इस साम्राज्य के पतन की एक बड़ी वजह यही अफीम युद्ध था और इतिहासकार मानते हैं कि इस साम्राज्य का पतन चीन के पक्ष में साबित हुआ था।

3 जून 1839 को सरकारी अधिकारी लिन जू ने 1.2 मिलियन किलोग्राम अफीम को जब्त करके उसे नष्ट कर दिया था। ब्रिटेन ने इसे अपने अपमान के तौर पर समझा। ब्रिटेन ने कई शहरों पर कब्जा कर लिया और करीब 20,000 लोगों की हत्या कर दी। सन 1842 को पहला अफीम युद्ध खत्म हुआ। चीन को मजबूरी में व्यापार को खोलना पड़ा, हांगकांग के साथ कई बंदरगाहों को ब्रिटेन के हाथों सौंपना पड़ा और साथ 20 मिलियन डॉलर का जुर्माना भी अदा करना पड़ा। इस युद्ध के साथ ही किंग साम्राज्य का पतन हुआ और बड़े पैमाने पर चीन में विद्रोह की शुरूआत हो गई भारत में पैदा की जाने वाली अफीम ब्रिटेन के लिए भारतीय राजस्व हासिल करने का सबसे बड़ा जरिया बन गई थी।

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