Punjab
यमुनानगर में बड़ा प्रशासनिक घालमेल: अवैध खनन रोकने के सरकारी नाकों पर 'रॉयल्टी माफिया' का कब्जा, डरे सहमे कर्मचारी; जांच की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे अधिकारी
अवैध खनन नाकों पर निजी लोगों का कब्जा, प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल
प्रताप नगर (सच कहूँ/राजेंद्र कुमार) Pratap Nagar News: जिले में जिला प्रशासन द्वारा अवैध खनन पर नकेल कसने के लिए लगाए गए विशेष नाके अब विवादों के केंद्र में आ गए हैं। बीती रात से इन नाकों पर एक हैरान कर देने वाला और गंभीर घटनाक्रम सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था दोनों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
सरकारी नाकों पर 'प्राइवेट प्लाटून' का पहरा
खनन और ओवरलोडिंग को रोकने के लिए जिन नाकों पर जिला उपायुक्त (डीसी) द्वारा बकायदा सरकारी कर्मचारियों की ड्यूटियां लगाई गई थीं, वहां अब रॉयल्टी ठेकेदारों के दर्जनों लठैत और प्राइवेट कारिंदे आकर बैठ गए हैं। गाड़ियों में भरकर आए ये प्राइवेट लोग नाकों पर आने-जाने वाले वाहनों को जबरन रोक रहे हैं, उनके सरकारी दस्तावेज खंगाल रहे हैं और खुद ही रजिस्टर में एंट्री कर रहे हैं।
यह पूरी तरह से गैर-कानूनी है क्योंकि सरकारी दस्तावेजों को चेक करने और सरकारी रजिस्टर भरने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ ड्यूटी पर तैनात प्रशासनिक कर्मचारियों के पास है।
सहमे सरकारी कर्मचारी, किसका है संरक्षण?
सूत्रों के मुताबिक, दर्जनों की संख्या में पहुंचे इन प्राइवेट बाहुबलियों के आगे नाकों पर तैनात सरकारी कर्मचारी खुद को लाचार और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्हें ड्यूटी करने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि: आखिर ये प्राइवेट कर्मचारी किस अधिकारी या किस विभाग की अनुमति से सरकारी नाकों पर कब्जा जमाए बैठे हैं?
क्या जिला प्रशासन ने अपने अधिकार निजी हाथों में सौंप दिए हैं?
यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी लंबे समय तक इन रॉयल्टी ठेकेदारों के कर्मचारी सरेआम सरकारी कागजात चेक करते और रजिस्टर भरते रहे हैं, जिसे लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
अधिकारियों का ढुलमुल रवैया: "जांच कराएंगे"
जब इस बेहद संवेदनशील और गंभीर मामले को लेकर एसडीएम छछरौली, जसपाल सिंह गिल से सीधी बात की गई, तो उनका जवाब बेहद औपचारिक रहा। उन्होंने कहा कि: "नाकों पर ड्यूटी सीधे डीसी ऑफिस (जिला उपायुक्त कार्यालय) द्वारा लगाई जाती है।"
जब उनसे तीखा सवाल किया गया कि क्या कोई भी प्राइवेट ठेकेदार या उसके बंदे सरकारी दस्तावेज चेक कर सकते हैं या रजिस्टर भर सकते हैं? तो उन्होंने सिर्फ इतना कहकर पल्ला झाड़ लिया कि "हम इस मामले की जांच कराएंगे।"
दमदार सवाल: क्या 'सिस्टम' घुटने टेक चुका है?
अब देखना यह होगा कि क्या यमुनानगर जिला प्रशासन इन प्राइवेट रसूखदारों के आगे नतमस्तक रहेगा? चर्चाएं तो यह भी हैं कि इस पूरे खेल को भारी राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। क्या राजनीतिक दबाव के चलते नाकों से सरकारी कर्मचारियों की अहमियत को खत्म कर दिया जाएगा?
क्या दर्जनों गाड़ियों में घूमकर गुंडागर्दी के दम पर गाड़ियां रोकने वाले इन रॉयल्टी ठेकेदारों की 'प्राइवेट प्लाटून' का राज यूं ही चलता रहेगा, या फिर जिला उपायुक्त इस पर कोई कड़ा एक्शन लेंगे? यह आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन फिलहाल, यमुनानगर के खनन नाकों पर कानून की नहीं, बल्कि ठेकेदारों की लाठी चल रही है।
