इतिहास के साये में खो गया गोरखपुर का सपूत, जो 18 साल की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत से भिड़ गया था

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स्वरूप सिंह शर्मा: वो नाम, जो आजादी की लड़ाई में गूंजा, पर इतिहास में कहीं दब गया

भूना (सच कहूँ/संगीता रानी)। Bhuna News: आजादी की लड़ाई की गाथा केवल उन नामों तक सीमित रह गई जो इतिहास की किताबों में दर्ज हैं, मगर भारत की मिट्टी में ऐसे अनगिनत सपूत दफन हैं, जिनकी कुर्बानियों को शायद ही कभी मंच मिला। फतेहाबाद जिले के गांव गोरखपुर के एक ऐसे ही वीर सपूत थे स्वरूप सिंह शर्मा, जिन्होंने न सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ 18 साल की उम्र में बिगुल बजाया, बल्कि ताउम्र देश सेवा की। मगर अफसोस, आज उनके नाम की कोई स्मृति तक नहीं बची।

1937 से आजादी तक, आंदोलन का हिस्सा रहे स्वरूप सिंह

स्वरूप सिंह शर्मा का जन्म 8 दिसंबर 1919 को गोरखपुर गांव में गुलजारी लाल शर्मा के घर हुआ था। पढ़ाई में दसवीं तक पढ़े स्वरूप सिंह ने कम उम्र में ही आजादी के आंदोलन का रास्ता पकड़ लिया। 1937 में जब अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह चरम पर था, तब उन्होंने खुलकर आंदोलन में भाग लिया। इसके चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा। लेकिन जेल की सलाखों ने न उनके इरादों को कमजोर किया, न हौसलों को। उन्होंने अत्याचार सहे, मगर देश को आजाद करवाने की ललक कम नहीं हुई। Bhuna News

दान में दी 6400 गज जमीन, बनी धर्मशाला

आज जहां लोग छोटी-छोटी चीजों के लिए नाम और शोहरत चाहते हैं, वहीं स्वरूप सिंह शर्मा ने 1985 में अपने गांव में स्थित करीब 6400 गज जमीन धर्मशाला निर्माण के लिए निस्वार्थ दान में दे दी। आज उसी जमीन पर धर्मशाला भव्य रूप ले चुकी है, जो समाज के हर वर्ग के काम आ रही है। इसके अलावा गोरखपुर में उनकी गोद ली हुई संतान के नाम करीब 10 एकड़ जमीन आज भी मौजूद है।

आजाद भारत में खादी आश्रम से जोड़ी सेवा, पर भुला दिया गया योद्धा

आजादी के बाद स्वरूप सिंह शर्मा ने पानीपत खादी उद्योग में सेवाएं दीं। वह समाज और देश से जुड़े रहे, लेकिन न तो उन्हें सरकारी फाइलों में कोई मान्यता मिली, और न ही उनके गांव गोरखपुर में कोई स्मारक या संग्रहालय बना। 1997 में उनका निधन हो गया, और तब से जैसे उनका नाम भी इतिहास से मिटा दिया गया।

परिवार की कहानी: दो बेटियां, गोद लिया भाई का पोता

स्वरूप सिंह शर्मा की दो बेटियां हैं। बड़ी बेटी जय देवी, जिनकी शादी पूंडरी में हुई और छोटी बेटी प्रेमलता, जो जींद में विवाहित हैं। बेटा न होने के कारण उन्होंने अपने भाई चंदगीराम शर्मा के पोते रोशनलाल को गोद लिया, जो आज गोरखपुर की पुश्तैनी जमीन की देखरेख कर रहे हैं।

क्यों नहीं मिली पहचान?

स्वरूप सिंह शर्मा उन सेनानियों में से हैं, जिनकी कहानियों को दस्तावेजों में जगह नहीं मिली। ना किसी पुस्तक में नाम, न किसी सरकारी दस्तावेज में पहचान। गांव गोरखपुर की युवा पीढ़ी आज उन्हें जानती तक नहीं, क्योंकि उनके नाम पर न कोई बोर्ड है, न इमारत, न यादगार। Bhuna News

अब सवाल यह है…

  • क्या हम ऐसे वीरों को यूं ही भुला देंगे?
  • क्या उनका संघर्ष केवल परिवार की स्मृति तक सीमित रह जाएगा?
  • क्या सरकार और समाज को अब इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए?

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