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कैराना की धरती ने दिए कई विद्वान, हकीम और साहित्यकार, आज भी कायम है गौरवशाली परंपरा
नवाब मुकर्रब अली के खानदान से मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी तक जुड़ी है इल्मी विरासत
कैराना (सच कहूँ न्यूज़)। कैराना शहर को केवल एक ऐतिहासिक नगर के रूप में नहीं, बल्कि इल्म, हिकमत, अदब और तहजीब की सरजमीं के तौर पर भी जाना जाता है। यहां के नवाब, हकीम, उलेमा, शायर और साहित्यकार देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक अपनी इल्मी और अदबी सेवाओं के लिए पहचान बना चुके हैं। आज भी कैराना में कई ऐसी बुजुर्ग और कदीम तजुर्बे वाली साहित्यिक हस्तियां मौजूद हैं, जिनका जिक्र किए बिना कैराना की इल्मी और अदबी तारीख अधूरी नजर आती है।
कैराना के इतिहास पर नजर डालें तो नवाब मुकर्रब अली का खानदान इल्म और हिकमत के क्षेत्र में एक खास मुकाम रखता है। इसी खानदान की इल्मी विरासत से मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी जैसी बेनजीर और इल्मी शख्सियत सामने आईं। उनकी इल्मी खिदमात ने कैराना की पहचान को दूर-दूर तक पहुंचाया। इस खानदान की इल्मी, हकीमाना और अदबी रवायत आज भी कैराना की धरती पर कायम है।
इसी खानदान के चश्म-ओ-चराग मशहूर शायर, साहित्यकार, पत्रकार, चित्रकार और हकीम रियासत अली ‘ताबिश’ उस्मानी कैरानवी ने भी अपने इल्मी और अदबी कामों से अलग पहचान बनाई है। उन्होंने साहित्य के साथ पत्रकारिता, चिकित्सा और चित्रकला के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। उनकी सेवाएं कौम और मिल्लत के साथ-साथ कैराना की ऐतिहासिक और साहित्यिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिहाज से भी अहम मानी जाती हैं।
रियासत अली ‘ताबिश’ कई पुस्तकों के लेखक और संपादक रहे हैं। उनकी प्रमुख पुस्तकों में 416 पृष्ठों की वृहद कृति ‘हरीम-ए-अदब’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह पुस्तक तीन अध्यायों में विभाजित है। इसमें उर्दू और अरबी शायरी, साहित्य तथा कैराना शहर के इतिहास से जुड़े विभिन्न पहलुओं को साहित्यिक और प्रभावशाली अंदाज में प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक के पहले अध्याय में उर्दू-अरबी शायरी और कैराना शहर के इतिहास को नसर(गद्य) के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। दूसरे अध्याय में अरबी साहित्य और शायरी की शुरुआत से लेकर मौलाना अशरफ अली थानवी की इल्मी और अदबी सेवाओं तक का उल्लेख किया गया है। वहीं तीसरे अध्याय में गजल और तगज्जुल के माध्यम से जिंदगी के अनुभवों, एहसासात और विभिन्न कैफियत को शायरी के रूप में पेश किया गया है।
पांच सौ साल का इतिहास शायरी में किया पेश
रियासत अली ‘ताबिश’ की एक अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक ‘अलमास-ए-कैराना’ है। इस पुस्तक में उन्होंने कैराना के करीब पांच सौ साल के इतिहास को शायरी के जरिए पेश करने का प्रयास किया है। इतिहास को नज्म के रूप में प्रस्तुत करने की यह कोशिश पुस्तक को खास बनाती है। इसमें कैराना के अतीत, यहां की प्रमुख घटनाओं और ऐतिहासिक विरासत को अशआर के माध्यम से संजोया गया है।
‘अलमास-ए-कैराना’ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी तीन भाषाओं में एक ही पुस्तक में प्रकाशित किया गया है। इससे कैराना के इतिहास को अलग-अलग भाषाओं के पाठकों तक पहुंचाने का रास्ता खुलता है। एक ही ऐतिहासिक सामग्री को तीन भाषाओं में प्रस्तुत करना लेखक की व्यापक सोच और अपनी जन्मभूमि के इतिहास को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने की भावना को दर्शाता है।
साहित्य से जुड़े लोगों का कहना है कि किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों, बाजारों और ऐतिहासिक घटनाओं से नहीं होती, बल्कि उन लोगों से भी होती है जिन्होंने अपनी इल्मी और अदबी सेवाओं से उस शहर को पहचान दिलाई। कैराना की धरती ने भी समय-समय पर ऐसे अनेक विद्वानों, हकीमों, शायरों और साहित्यकारों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने हुनर और कलम से इसकी पहचान को मजबूत किया।
आज जरूरत इस बात की है कि कैराना की इल्मी और साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। स्थानीय इतिहास, साहित्य और यहां की महत्वपूर्ण शख्सियतों पर अधिक से अधिक सामग्री प्रकाशित हो तथा पुरानी पुस्तकों और दस्तावेजों को सुरक्षित किया जाए। इससे आने वाली पीढ़ियों को अपने शहर के गौरवशाली अतीत और इल्मी विरासत से रूबरू होने का अवसर मिलेगा।
कैराना की मिट्टी में दफ्न इतिहास को शब्दों में जीवित रखने का यह सिलसिला न केवल अतीत का संरक्षण है, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए एक बेशकीमती इल्मी विरासत तैयार करने की कोशिश भी है। ‘हरीम-ए-अदब’ और ‘अलमास-ए-कैराना’ जैसी कृतियां इसी साहित्यिक चेतना और अपनी सरजमीं से जुड़ाव की मिसाल पेश करती हैं।
